Saturday, 26 April 2014

तुम्ब 
तुम इतनी नटखट 
ये सरे सारे घर को उलट   हो हो 
न सोती हो , न सोने देती हो सारे घर को 
 उलट पलट करने का ये तुम्हारा फितूर 
ये मेरी किताबे  
 तो पारिजात आने की है 
तुमसे कुछ नही सम्भलता 
 बनाओगी 
दोस्तों के संग बातें  मजाक 
और एक दो की टांग खिचाई 
ये तुम्हारी और तुम्हारी बहनों की 
प्रिय खेल है 
 के किसी कोने में सब अपना सामान dauble
लेकर बैठ जाओगी 
और तुम्हारी हंसी 
 कितनी मधुर 
अरे तुम्हे है कितना सौर 
सौर हमे पता है 
तुम्हारी  राग रग से वाफिक हूँ 
आज से नही 
जमाने से। .... क्या समझती हो, 
अपने अपने आपको। ……। 
घर के इस कोने से वंहा तक 
तेरा ही  है 
संवार ले ये संसार 
और वो भि.... 
तुझे क्या  कहु 
सलोनी नटखट चपल और  
किन्तु तुम तुनकमिजाज और 
 में तुम तेज तर्रार तुम बहुत अच्छी बहुत प्यारी 
और बेहद मासूम 

Wednesday, 23 April 2014

Rajnigandha Phool Tumhare (Rajnigandha - 1974) HQ

Prem Pujari - Shokhiyon Mein Ghola Jaye - Kishore Kumar - Lata Mangeshkar

Prem Pujari - Shokhiyon Mein Ghola Jaye - Kishore Kumar - Lata Mangeshkar

Mili - Aaye Tum Yaad Mujhe - Kishore Kumar

Mili - Badi Suni Suni Hai Zindagi - Kishore Kumar

अब अतीत से वर्तमान में लौट रही हूँ 
अपने बेटे के जीवन को संजोना है 
उसे सम्भालना देखना है 
kl likhungi 
वो घर वो संसार 
सब बिट गया 
ये समय वो नही है सब कुछ तो बदल गया है किन्तु मेरी स्मृति में आज भी नवाधीन है वो, चली गयी थी, उस बरस अपने पीहर, वंहा से अपने दुर्योग से मुक्ति के लिए चली गयी थी , अपनी बड़ी बहन के यंहा, वो गाँवों का शांत जीवन, जन्हा होते है , पांव पांव चलने के के जज्बात, बुआ जी ने, अपनी सौत को छोटी बहन नही समझा होगा, किन्तु, नवदीन की मौजूदगी घर में बहुत सहारा थी, घर को लिपटी ही नही, एक वक़्त का खाना बनती थी, और सामने की छापरी में रहती, बीच के कक्ष में सोती थी, जन्हा तिजोरी का कमरा था, जन्हा से पतन की सीढियाँ थी, नवदीन ने तो मुक्ति प् ली थी, वो इतनी आसानी से चली गयी की , बुआजी सकते में रह गयी, बुआ तो इन्ही सोचती थी, की नवदीन तो हिस्से की हक़दार है, सब कुछ खोकर भी धन से इतना मोह। ....ओह.बउअजइअकएऌइऋअहगयइ 
ये तुम.... क्या है बताओ, क्या कहोगी , चिड़ाने की नई तरकीब देखो। । 
तो, उस बरस बारिश लग गयी थी, बुआ जी देखा करती थी, नवदीन के लौटने की राह, सब आँगन में बैठे, उसीकी बातें करते थे , ढलती साँझ भी तो उदास हो जाती थी, की वो नही लौटेगी, जिसने कम उम्र में देखे थे, जाने कितने अनजाने दुःख ,,,.... और फिर उसके न रहने की खबर लेकर ए थे, गांव से कोई, शायद नवदीन के भाई। ।न्वदिन उनकी छोटी बहन थी, बड़े घर में पात का ब्याह होकर गयी थी 
नवदीन नही रही, ये खबर सारे गांव में फ़ैल गयी, पुरे मोहल्ले वाले आकर जमा हो गए थे, बुआजी को सभी सांत्वना दे रहे थे, बुआजी प्रारब्ध के इस मजाक पर हताश थी, नवदीन ने ये कैसा बदला लिया था, वो विद्रोहिणी आखिर चली गयी, वीतरागी, ने कभी धन पर हक़ नही जताया, कुछ माँगा नही, वो तो, अपने होने का अहसास भर करती थी
मई बुआ जी के संग उस गांव तक गयी थी, बुआ जी ने सबसे बीड़ा ली थी, वंहा जाकर फिर ढलती साँझ थी, और बुआजी, ने उसे चित की अनुमति दी थी, सुपरडे खाक होने के पहले वो, सब कुछ बुआजी को सौंप गयी, नही जताया उसने कोई हक़, तिरहित जैसी आई थी, वैसी ही गयी 
बुआ जी की आँखें भीगी थी, कांपते हाथो से उसके माथे पर गुलाल लगाकर बिदाई दी थी, और लैयत आई थी, बुआ जी मुझे लेकर अगले दिन अपरान्ह तक, नौकर गाडी लेकर नही आया तो, हम पिपरझरी से पैदल आये थे , बुआजी की थकी सुस्त चल....ek एक कर घरके सभी चले गए थे , और। .... और मई बोली थी, बाई अब वो नही आएगी क्या 
बुआ जी से मैंने पुछि थी, वो कहा चली गयी , फुआ बै… 
तो, वे बोली थी, की वो उसके गाँव के जंगल में गम रही होगी.... मई आजभी सोचती हु, की कोई जाता है, तो कहा चला जाता हा, कहा गम हो जाता है, ये शरीर कहा जाता है। । कभी मई भी बेटे से छिड़कर कहती हूँ, तुम मेरे जीते जी कुछ नही करोगे उसे कहती हु, मेरे मरने के बाद सब करना, अपने धर्म को मन्न… 
जब मई नही रहूंगी, तो किस्से गुस्सा करोगे। । और बेटे से कहती हूँ, की मई मुंबई से मरने पर ही लौटूंगी, अब इन्ही संघर्ष करूंगी.... 
तो, नवदीन के जंगल में जाने की बात मैंने मान ली, फिर बुआ जी से सवाल नही की, मुझे पता था, वो जंगल में चली गयी है 
फिर, सब बुआजी को घेरकर बैठ गए थे, आँगन में ढलती साँझ में बुआजी ने सबके साथ नवदीन की ही बातें कर रहे थे, सबको इन्ही लग रहा था, की वो अभी बिचके कमरे से निकलकर आएगी , वंही ऊँची गोरी, वद्रोही , अपने रूप पर दुर्भाग्य को हावी नही होने देनेवाली नवदीन। … लेकिन वो लौटी भी तो, चुड़ैल ब्नके… और मुझे कब डरने लगी, ये धीरे धीरे कुछ माह बाद पता चला, किसीको नही वो बीच कमरे में मुझे दिखती थी,
वो बरस फिर तेज घटनाक्रम में गुजरा थ.... 

Tuesday, 22 April 2014

बुआ जी के 
बुआ जी के घर का अकेलापन 
उनका दुर्भाग्य क्या उन्होंने चुना था 
नही ये तो उन्हें उस सम्पति के साथ मिला था 
जो, उन्हें पीटीआई के घर में मिली थी 
अतः अथाह सम्पदा और साथ में अकेले होते जाने के हालत 
बुआजी के घर मई तब आई थी जब वो पीटीआई 
पाती पति  को व् पुत्र को खो चुकी थि. जब जीवन में दुर्योग ने उन्हें तोड़ दिया था, वे बड़े फूफा के यंहा जाती थी, हमारे गाँव , जन्हा बड़ी बुआ जी उनकी जितनी थी, अर्थात एक ही घर में दोनों सगी बहनें ब्याही थी घर में जो 
धन सम्पति का सैलाब बहते आया था, वो बड़े फूफा के घर ज्यादा था, वंही वे जाती थी, वंही मेरी माँ व् पिता हम सब बहन भाईयों के साथ रहते थे 
ये तो मई कई बार बता चुकी की, मई छोटे भाई के होनेपर इधर उधर रहती, राख कहती, और , मेरी छोटी बुआ आती तो, उनकी गोदी में जाकर बहुत  , बुआजी ने मुझे संग ले जाने का फैसला किया 
बुआजी के घर थी, उनकी बूढी ननद, बुआजी उसे नहला दिया करती, फिर शायद उसकी भी मौत होगयी 
थी , बुआजी की छोटी सौत nvadhin  ये नाम यंहा सही नही लिख प् रहा है, वो थी, जिससे मई ज्यादा नही बात करती 
या वो मुझे ज्यादा नही लड़ करती।  किन्तु एक वक़्त बहुत सुबह ५ बजे का होता, जब बुआजी निवृत होने पिछवाड़े गयी होती तो, मई उठकर नवदीन के बिस्तर में चली जाती, और वो भी मुझे सुला लेती, बुआजी जब लौटती तो, कहती जागेश्वरी कहा गयी , ये ही उनके बीच का एक परिहास का पल होता था 
बुआ जी के घर नवदीन जैसी भी थी, एक साथ तो था ही, किन्तु नियति को ये भी मंजूर नही था मई स्कुल जाने लगी थी, सुकनंदन जी रामायण पढ़ने आते , मई पुरे घर में खेलती, धीरोजा संग रामलीला देखने जाति. दिन मजे में गुजर रहे थे 
नवदीन घर को लीपा करती, कामवाली व् नौकर के बावजूद घर की औरतें म्हणत व् घरके सभी काम करती, खेती के काम  को छोड़कर , किन्तु अनाज फटकना भी करती, घरमे अनाज होता, सबकी देखभाल करना नित्य का काम था, नवदीन जब खाली होती तो, वो कथड़ी सिला करती, मई ये बता दू की औरतें घर के स्वछता के अलावा अनाज के सभी कार्य करती , बुआजी चक्की में डालें ओपिस्ति, या कोई आता, जिसके कई तरह के व्यंजन बनती, त्योहारों का समय घर में व्यंजन पकवानो के बनाने का समय होता, जो सभी को बाँटना भी होता था , वाकई वो वक़्त था, जब सबके साथ जीते थे, खेती, कुदरत , प्रकृति के सामजस्य में जीवन चलता था,
सामंजस्य 
एक वक़्त का खाना नवदीन बनती थी, जब हम हमारे दूसरे गाँव जाते तो, खचर खाचर या बैलगाड़ी में जाते थे, बहुत अच्छा लगता था, नवदीन भी साथ चलती, लेकिन बड़ी बुआ जी के यभा उसे ताने सुनने होते, बड़ी बुआ की बेटियां उसपर तंज कस्ती, यंहा तक की काम वालियां भी छोटे फूफा की उस नई नवेली विधवा हो चुकी पत्नी पर व्यंग बाण चलती थि. गोरिचित्ति , बेहद सुंदर नवाधीन कैसे दांतों के बीच जीभ की तरह रहती थी, सभी की बातें सुनते हुए जीवन जिन, और जब सबको खिलाकर खाने बैठती तो, सब तने कस्ते, बातें सुनते की, नवाधीन तो, मन भर भट कहती है इतने पर भी उस विद्रोहिणी का न रूप कम होता था, न तेज, जवानी तो, जैसे सावन की नदी जैसी चढ़ी थि.... वो हरी सूती कस्ते की साडी पहनती थी, उसमे भी उसका रूप खिलता था, ऊँची गोरी, वैसा ही सौंदर्य था उसका , उतनी ही तेजस्वी थी, तेज जबान नही चलती पर, उसके तेवर कहते थे की, वो नही सहती ये बातें। …होते होते कब पीलिया की चपेट में आ गयी थी पता न्हि… दवा कोइन्हि करता, उसके मायके वाले भी डरकर रहते था 
नवाधीन शाम के पहले से सामने की छापरी में दलन में बैठी , हर आने जाने वाले को देखती.... जब हमारे घर के आँगन से गुजरते लोग पांव पटकते तो, कुछ नाराज भी होति… जाने नवदीन कौन सा सौभाग्य लिखके आई थी, की उसे पीलिया हो गया , और उस बरस वो, अपने पीहर गयी थी, हर साल ही जाती थी, किन्तु नवाधीन उस बरस गर्मी से गयी तो, नही लौटि. बुआजी ने भी खोज खबर नही ली , की कैसी है नवाधीन को ज्यादा भात खाने से पीलिया हो गया था, बड़ी बहन जीजा के घर रही, कुछ देशी दवा हुई हो, किन्तु मनके संताप का इलाज नही था , और फिर बरसात लग गयी थी, पहली बारिश होने लगी थी, बुआजी को नवाधीन की याद आती तो, वो बेचैन हो जाती थी, सौत थी, लड़ती भी थी, पर घर में उसका आसरा था, घर की भीतरी ककस में वो  रहती थी, उसकी खत व् बिस्तर वैसा ही वंहा पड़ा था,सब आते तो आँगन में बैठे देरतक बातें करते।  बुआजी से पूछते , बाई, वो आई क्यों नही जी , बुआ जी क्या जवाब देती, सुनी आूँखों से राह देखती , बारिश के संग मनमे तूफ़ान उठा करता, सबकी बीती बातें याद आती थी , बुआजी की आँखे तब सबकी यादकर भींग जाती थी, सब एक एककरके जा रहे थे मई चुपचाप उनकी गोदी में सा जाती, बुआजी को देर रात्ततक नींद नही आती थी, दुर्भाग्य और मौत का झंझवत फिरसे आय....vo बरसात तूफानी थी, कैसे हरहर मेघ बरसता था, 
और फिर नवाधीन की मौत की खबर आई थी,.... सबकुछ बुआजी के हथेली से रेट की तरह से फिसल गया था, ये बहुत दारुण दुःख था, बुआजी ने कैसे झेल होगा, उस ह्रदयविदारक खबर को.... ये दुर्भागय तू किसी को मत मिलन.... हे ईश्वर,,,, तुम सबको सुख दो.... 

Monday, 21 April 2014

बुआ जी का पुत्र नही रहा 
बुआ जी ऐसी हो गयी की उन्हें  उठाना  था 
 सी निर्जीव  निरीह सी 
 कैसे झेल था 
भगवान बुद्ध होते  कहते 
की, वंहा से दिया जलाकर लाओ 
जन्हा मौत नही हुई हो 
किन्तु ये बहुत विकत था 
साहूकारी का धान संहार लाया था 
जिस धन में गरीबों के आंसू , खून पसीने की गंध हो 
वो, राजपाट कैसे चैन लेने देता 
बुआ जी शोक के सागर में डूब गयी थी 
किन्तु फूफा तो जी ही नही सके 
एक दूसरा पात विवाह किया गया की बीटा 
बीटा बेटा होगा ,किन्तु नही हो सका 
पुत्र के जाने के बाद फूफा पांचवें वर्ष सिधार गए 
एक साँझ सर दर्द की शिकायत हुई  पुण्यात्मा 
राजपाट छाड़कर गए 
पीछे रही, दोनों पत्नियां , नई पत्नी तो ४ वर्ष के विवाह की ही थी 
ये दुर्दिन का आरम्भ था 
बुआ ने उनकी स्टेट को संभाला 
किन्तु दुर्भाग्य ने कभी मेरी बुआ जी का दमन नही छोड़ा 
वे सम्पति संभलकर दिल बहलाती रही एक सौत थी, घर आँगन, खेत खलिहान व् गौओं के कोठे थे और 
घर की तिजोरी में साहूकारी का जेवरात था 
नकदी तो जेठ ले गए थे, किन्तु बुआ ने फिरसे वैसा ही वैभव लाया , किन्तु क्या करती कोई खर्च नही, सिर्फ आय होती थी, जाने कितने खेतों से धान आता था, कितना संभालती 
सुने घर आँगन में थी दोनों सौतन, आमने सामने खली म्यान की तलवार जैसी 
बुआ अपने पुत्र को खोकर दुखी, क़तर 
कातर और दूसरी यौवन के मद से तानी , तनी हुई 
हमेशा वो विद्रोही ही रही 
जब बड़े फूफा के यंहा जाती तो 
नवाधीन की हमेशा हंसी उड़ाते 
कहते कितना भात कहती है 
उन्हें उसके दुखों से क्या मतलब था जिसने पहले पीटीआई से विछोह के बाद दूसरा सम्पन्नं घर पाया, किन्तु 
पीटीआई सुख क्या मिलता, प्रौढ़ फूफा उसे छोड़कर चले ग्ये…व्न्ह जिसके बारे में कोई नही जनता की 
आते कहा से है और जाते कहा है 
कैसे हुई युवा नवदीन की मौत। ....... उसका सही नाम नही लिख सकी हुन… 

Sunday, 20 April 2014

बुआ  रहती थी, उनकी सौत , नाम था , नवदीन 
नवादीन , नही नवाधीन 
नही नवादीन 
ये नाम अलग आ रहा है, उसके नाम का मतलब होता है 
नई नवेली 
वो, बहुत दुखी व् कुछ जिद्दी थी 
वो, बुआ जी के एकमात्र पुत्र के अवसान के बाद लाइ गयी थी बुआ जी का बचपन में विवाह हुआ था, कई बरसों तक , औलाद नही हुई , तो बुआजी ने जमीं पर खाना खाया था, वो  थाली में नही , जमीं लीपकर उसपर कहती थी, कई बरसों की तपस्या के बाद मिला बीटा, किन्तु रहा सिर्फ ११ बरस, बहुत होनहार, खेल दिखने वाला बीटा था, दोनों हाथो की अंजलि में भरकर पैसे लूटता था जैसे मई तिजोरी पर रखे पैसों को दोनों हाथों की अंजुली में भरकर ले जाती थी, और एक मूर्ति खरीद लती थि…। बुआ जी की सौत आई थी, बेटे के नही रहने पर,
बाबू नाम था , बेटे का, उसे धनुर्वात हुआ था, जिसके लिए जिला अस्पताल में रो रोकर , हमारे बड़े व्  ने 
फूफा ने डॉक्टर से विनती की थी, पांव पकड़ कर डॉक्टर से कहा था, डॉ  साहब,बेटे को  , इसके  वजन के बराबर पैसे तौलकर देंगे , किन्तु नही बचा  पाये,और बुआ जी ने वो दुःख झेल , जो कल्पनातीत है 
Very hard, trembling touch axis of the moon in water,
Well, a stop time so intense, serious though that was the Samadhi of Yogi 
LIPA coated nights aunt's home Cbe Home  में  चन्द्रमा के उजियारे में 
Coral , मुनगे के पेड़ की शाखाओं को हिलते देखना, और भय की कोई हिलोर तब मन में नही थि. प्रातः के पहले , अलसुबह का चांदनी का उजाला भी छाँव जैसा होता, इतनी गहन तल्लीनता की, आज भी 
Mine ध्यान लग जाता है 
Aunt के साथ, उनके पीछे दौड़ती भगति मई थी, बुआ जी अपने काम में लगी होती तब, भी मई उन्हें देखती 
When बुआ जी अपने घर के बीच गृह को लिपटी, जब वो सिलबट्टे पर चटनी पीस रही होती, तो, मई ३ वर्षीय 
Their भतीजी उनके कंधो पर झूल रही होती, पीठपर लड़ी हुई 
Aunt के कामों का वक़्त और मेरा सामने बैठकर, गुरसी की रख का टेस्ट लेने का वक़्त होता, फिर मई सामने की छपरी में लगी अलमारी से एक , तिकोना कांच का खिलौना लाती , और उसमे चूड़ी के टुकड़ों के आकाश 
Axis देखा करती।  ये मेरा सतरंगी सपनों से पहला साक्षात्कार थ. मैंने महसूस की थी, स्वाधीनता व् स्वाभिमान भरी जिंदगी की गौरव व् दर्प से भरी जिंदगी, जिसे मेरे विवाह के बाद एक झटके से टूटना था, ये नही मालूम था, की बाद में इतना संघर्ष होगा, मुझे सबसे पहला झटका ये लगा, की मुझे वैसा बड़ा सा घर नही मिला, किन्तु, मैंने अपने घर को बसने में कोई कसार।, कस्र कसर बाकि नही राखी बुआ जी के घर मेरे बहुत साथी थे , एक मिट्ठू था, जिसका पिजरा तक मुझे कभी उठाने नही कहा गया , बादमे माँ ने मुझे सब काम सिखाया, किन्तु बड़े घर में रहने और आराम से रहने, यंहा तक की किसी की सेवा करने की आदत नही थी 
Whatever सहज स्वभाव था, वो स्वयं से ही सहज रूप से अनुशाशन में रहने का था 
 से किस  ली , ये रे....... 

Saturday, 19 April 2014

वो जो रातों का सुरूर और नूर था , एक गुरूर सा मन में था, एक दर्प चेहरे पर था वो, आँगन उजले उजले 
उजियारे पक्षे कौंधते थे, ख्याल जैसे जलते आलावों की छाँव में 
मेरी बुआ जी के गाँव में जलती थी, जाड़ों में जो अंगीठी उसे गुरशी कहते थे 
दिन ऐसे थे, जैसे गुरुमंत्र पढ़ रहे हो रातें ऐसी थी, जैसे धमनियों में कोई मदिर सा प्रवाह झनझन बाह रहा हो 
आँखे थी, निर्निमेष अधमुंदी सी निश्छल , अनजान दुनिया दारी से 
वो रातें किस कदर चांदनी में धीमी सांसे लेती सुस्ताती थी बुआजी जब  सुलाने कुछ गुनगुनाती थी जब, मई हल्की नींद में जागती 
और बुआ जी से पूछती , ये कड़वा कसैला धुंवा मेरी आँखों में कहा से आता है तब उस बड़े वीरान घर का 
रहस्य जैसे मेरी मासूम अंजानी आँखों में कुछ कह जाता था 
जिसका पता मुझे सीढ़ियों पर चुड़ैल के रूप में झलका करता 
और मई उस वीराने घर में चीखकर बुआ जी को पुकारा करती जबतक 
बुआजी काम छोड़कर मुझे लेने नही आती 
वो, चुड़ैल मुझे द्राया करती थी वो, मेरी बुआजी की मृतक सौत थी, जो उसी बरस मर गयी थी, कैसे 
शेष फिर। ....... 

Friday, 18 April 2014

बुआ जी के मीठे मधुर गीत 
उनकी आवाज गूंजती थी 
उस रातों में जन्हा वीराने थे सूनापन था 
दुखके गहरे साये थे आत्मिक सात्विकता थी किसीकी गुलामी नही थी कोई गाली 
गलौज की भाषा नही थी , हम सब थे, प्रेम व् आत्मीयता के रेशों में बंधे 
निस्वार्थ, बिना एक  चाहते , एक दूसरे का साथ निभाते, सभी के पास अपने लायक घर थे, वो मिटटी की 
मोती दीवारों के घर, शीतल छाँव वाले घर, जन्हा सूरज चाँद अपना, डेरा डालते, धुप छाँव का डेरा होता, जन्हा रात और दिन आते जाते थे, चरवाहे की तरह, उनके अँधेरे उजाले साथी थे, उनींदी रातें, कुछ कहती थी, सबकुछ लयबद्ध था, और , संगीत था, जो जलतरंग की तरह, आत्मा में निनाद करता, उतरता रहता, एक मधुरतम रिश्ते की तरह उन दिनों से मेरा गहरा आत्मीय लगाव थ…।वो गीत जो बुआजी गाती थि.... कल बताउंगी, उन्गितों के बोलों को। 
बुआ जी के घर रात को सोते ही कड़वे धुंवे का अहसास होता और मई तड़पकर उठकर बुआ जिसे कहती 
ये आँखों में जलन क्यों होती है वंहा की शांत सन्नाटे भरी रातों का अहसास है 
वंहा के पवित्र आंगनों में जब चन्द्रमा की उजली छाँव होती, प्रसारित 
वंहा हर और बिखरा होता था, शांत सात्विक सन्नाटा, जिसे आजतक महसूस करती हूँ, 
मेरे भीतरसे बुआजी का घर आजतक नही गया है वो, भीतर स्थिर है जब बहरी 
बाहरी हलचल नही होती , तो मई वंहा चली जाती हूँ चाहती हूँ, की बुआजी के घर को अपने मन से दूर क्र्दु…। 
वो, अलग ही वक़्त था, ठहरा हुआ तेरी तो 
आयशा पुरे मोहल्ले की चहेती है एक सालकी आयशा बच्ची है 
किन्तु कितनी सच्ची है सरे सारे भेदभाव से दूर वो मासूम बच्ची सारे दिन 
कैसे पूरी कॉलोनी की  लाड़ली बंगई बनगई 
बुआ जी के घर आनेवाली मेहतरानी धीरोजा, मेरी दायमा की तरह थी वो मुझे  चाहती थी, जितना 
बुआ जी मुझे चाहती थी बुआ जी , और धीरोजा मुझे कितना चाहती थी, ये बताने मेरे पास वो विस्तृत 
आकाश ही तो है 
बचपन में भी ढलती साँझ में मई विस्तृत नभ को देखती और घिरती रात को महसूस एक भय, एक आशय करता सन्नाटा , उस बड़ी सुने घर में था, जो इतना बड़ा था, की आधे से ज्यादा हिस्सा बंद रखते थे 
मेरे और बुआ जी के साथ, कोठे में बंधी गौएँ,  बैलों,व् बैंसों का तो, काफी दुरी पर बसेरा था, घर के लम्बे आँगन, बरामदे, कोठे, व् खली ढेर साडी जगह , बुआ जी का रीता जीवन, सब एक्स था, वंही से सूनापन आया हो, की उन यादों में एक रहष्य है, उन्सुल्झे प्रश्न है वे आती हुई राते, लम्बी उदास व् भय से भरी होती थी जब सब चले जाते, मई बुआजी के साथ, सामने के कक्ष में पलंग पर सोती, द्वार लग जाते, तो अक्सर उठकर कहती 
बुआ जी मेरी आँखों में जलन होती है, ये धुआं सा क्यों है 
बुआजी कहती, कहा है, धुवाँ , मई कहती बुआजी, मेरी आँखों में जलन होती है ये धुवाँ रोज लगता था 
बुआजी परेशान हो जाती थी , और ढेरसारे गीत गति, गुनगुनाती थी, तब मुझे फिर नींद आ जाती थी 
ंबहुत चाहती थी , मेरी बुआ जी मुझे 
मई उनकी बेहद लाड़ली भतीजी थी , शायद बेटी को भी वो इतना नही चाहती 
जितना उन्हें मुझसे लगाव था 
फिर मई क्यों उन्हें छोड़कर आ गयी, ये कल 
बतौनगि....... अपने जीवन के वो रहष्य भरे प्रश्थ…। 
I like 
Nights spent a day to remember expenditure aunt's home 
She has had waited so long, has ever settle in mind, it seems, with not undergone 
Moving along, like the memory of dear unabated fall in thought, he is my day 
To date, with me, life was like, what today is reassuring Socke 
Including those scattered memories of May till date not been able to Puarnpaton, picked a little bit every day 
However, this is mind, the scatters them again 
And May during exams reading a text book Suruse them I look like a shell,
And each time I do a new beginning 
In the beginning only get so much joy,
Cortk not allowed to reach the other end by reaching a 
Maybe my Mnme these fears are mixed, with memories of the day-no bits will Kanhi 
Like the blade, so the birds will not Snjke 
My childhood memories are very rich 
You know, Aunt May's house had won a tree with flowers and leaves Expenditure 
Mates were not with me, characters to nature, Wanhi was playing with me, aunt live Btiati from passers absorbed in his work, and May plays had come from Uttar Pradesh Kulahten their recruitment, it was my habit, when the aunt-in-law reclining on the bed, his palm Tikaye on the neck, sides, to take to bed Btiati, simply called 
On interaction with the rest, then come and play Aunt May live across the top of the recruitment Kulaten 
She also moving quickly to play again by 3-4 Kulahten 
What to play, at home Flooring made in Cpri Lngddhap Girl plays, visual, Wanhi sitting, Dhiroja 
Which, by the aunt would be a little bigger Umrki, say, small-bye, do not jump, will be happy to laugh,
--- May the close Kkelna tell Dhiroja, Dhiroja Bai, the laughter is what KHUSI 
I can not answer that Dhiroja Segal husband was then in my day, Dhiroja him to sit in front of her horror Ratibarh  

Thursday, 17 April 2014

वो बुआ जी के घर आँगन के 
वो दिन , रातदिन जैसे  एक जैसे कुछ गेट गाते गुनगुनाते हुए निकल जाते थे बुआ जी के बड़ी महल जैसे घर में अकेलापन नही था, सारा दिन कोई न कोई आता था, बुआजी की परिचित मोहल्ले वाली कई औरतें, बच्चियां, सब मिलने आते 
आदमी होते तो, वो सामने ही रहते 
घर में सीधे हरकोई नही आता था 
वाकई तब घर घर थे 
बिखरे हुए, की भावों से भरे 
सारे दिन के लिए घरके अलग हिस्से होते थे यदि सुबह की आग चूल्हे में एक जगह जलती तो दुपहर को खाना दूसरी जगह बनता साँझ का चूल्हा अलग सुलगता , और ठण्ड हो, तो रात की अअंगिठी अलग सुलगती 
ये रिवाज भी था, सुविधा भी, की, घर में सुबह दोपहर , व् रात के वक़्त अलग अलग हिस्सों में आग जलती, अलाव व् अंगीठी अलग जलते, घर इतना ही बिथरा होता था , की आज भी मई घर को समेत नही पति घर की व्यवस्था ऐसी थी की, घर का काफी हिस्सा खली रहता, जिसकी हमे आदत थी घर का सहन, छापरी , सब अलग होते. कोठों में भी गौओं को सुबह शाम दोपहर को अलग थानों पर बांधते थे ये बहुत अच्छा था, उन्हें चरने घूमने भेजते, एक ग्वाला उन्हें चरता, कोठों में उन्हें दूसरा उन्हें बंधता, व् चारपानी देता, मुझे एकड़ एकाध बार बुआजी गौओं व् भैंसों को चारा देने कही होगी, मुझे लगता है, ये हमारी जिम्मेवारी है, की हम अपने घरके पशुओं की देखरेख प्यार से करे।  हमारे बाबूजी, आजतक घरकी गौओं को चारा पानी जरूर देते है, क्योंकि, अब पहले, जैसे ४ या ५ नौकर नही होते , तब हम कल्पना नही करते थे, की घर में कभी नौकर नही आये, तो हम कैसे उतने बड़े घर की झाड़ू लगाये, आजतो, सारा काम खुद ही करना है वक़्त कितना बदला है, की अब नौकर मालिक का युग वंही है, जो दौलत वाले हो 
ये गर्मी के दिन ,
दोपहरिया 
मुझे बहुत दूर ले जाते है, जब मई लिखा करती थी 
मई अकेली   दोपहर भर लिखती थी रात भर लिखती थी 
अपने नावेल 
उसके पत्रों के साथ ही 
सोती जागती थी जब मेरे साथ कोई नही था 
मेरी कहानी के पात्र ही तो थे 

Sunday, 13 April 2014

Chaudhavin Ka Chand Ho - Guru Dutt, Mohammed Rafi, Chaudhavin Ka Chand Song

घर- छतनार 
घर आँगन 
घर आँगन 
छतनार 
बनारस की बयार 
तेरे आने से 
जिंदगी में है बहार 
ये तेरा प्यारा प्यार है 
हमे उपहार 
बुआ जी का घर 
निशीथ में 
रातों में 
कितना शांत होता था 

Thursday, 10 April 2014

माँ से आज  बात हुई 
माँ बोली , क्यों नाराज है 
मई माँ से नाराज नही थी 
क्या बात करूं 
यंही सोचकर मोबाइल पर बात नही कि 
माँ के होने से घर में जो भावना है 
वो, माँ कि म्हणत, त्याग, व् सहनशीलता से है 

Friday, 4 April 2014

Aane Se Uske - Tanuja & Jeetendra - Jeene Ki Raah - Bollywood Classic Songs

समर कम्प के लिए
लिख रही हु स्मृति चिन्ह
व् गीत बचपन के
आपसे निवेदन है कि जंहा भी जाये 
अपने आसपास 
अपने घर आँगन में 
समर केम्प जरुर चलाये 
कैसे 
बहुत आसान है 
सुबह शाम, दोपहर 
आप जब जंचे 
आपको, व् बच्चों बुजुर्गों 
सभीको 
अच्छा लगे 
वंहा एकत्रित होईये 
और गीत सुनाये 
बच्चों को कहे वो भी 
अपने गीत, कविता , नृत्य करे 
सुनाये 
बताये 
सुने समझाये 
कुछ चित्र , कुछ फूल बनाये 
और बहुत कुछ है 
बच्चों के लिए 
रोज बताउंगी 
सबसे मधुर मस्त आवाज 
होती है 
बहते पानी कि 
एक रवानी होती है 
एक जिन्दा मस्ती होती है 
जब हमारे सामने 
कोई नदी मचलती हुयी बहती है 
सबसे सोंधी महक होती है 
गुड़धानी कि 
दूर तक कछार में 
जाड़ों कि बहार में 
दूरतक फैली होती है 
महक खलते रस कि 
उबलते गन्ने के रस कि 
गंध महुए कि तरह 
मीठी और बौराई सी होती है 
सबसे शीतल छाँव होती है 
छप्पर छानी कि 
वंही छप्पर टप्पर 
जो, किसी गरीब कि म्हणत से 
शीतल होता है 
सबसे प्यारी कहानी होती है 
बचपन में सुनी 
नानी के मुखसे 
आँगन में 
सितारों कि छाँव में 
मामा के गांव में 
गर्मी कि छुट्टी में 

Wednesday, 2 April 2014

बुआ जी का घर 
जैसे हवाएं सर सर सर 
घर तो था 
जैसे आश्मान पर 
आसमान पर 
और मेरा दिमाग भी था 
कुछ आश्मान पर 
 हमेशा वंहा कुछ न कुछ खेलती 
अकेली ही खेलती 
साथी थी ,
मेरे संग प्रकृति 
और बुआजी 
साथ थी 
जैसे समूची धरती 
क्या बताऊं 
कितना सुनाऊँ 
कि वो वक्त नही 
वो , मेरा अमृत काल था 
जो, कुछ बिट गया 
कुछ मेरे भीतर 
आज भी 
जीवन के रूप में 
मौजूद है 
बुआ जी के घर के अहसास को जीती हूँ 
ऐसे जैसे घूंट घूंट अमृत को पिटी हूँ 
कितनी जीवंतता थी , उस काल में 
जैसे एक समूचा युग बिट गया हो 
और मेरे हाथों से 
वो, अतीत रिट गया हो 
एक चिरिया 
जो, बाबूजी के आँगन में गति है 
मुझे बहुत याद आती है 
फिर वक़त नही मिलता 
कि, गति को गाती क्र सकू