Thursday, 17 April 2014

वो बुआ जी के घर आँगन के 
वो दिन , रातदिन जैसे  एक जैसे कुछ गेट गाते गुनगुनाते हुए निकल जाते थे बुआ जी के बड़ी महल जैसे घर में अकेलापन नही था, सारा दिन कोई न कोई आता था, बुआजी की परिचित मोहल्ले वाली कई औरतें, बच्चियां, सब मिलने आते 
आदमी होते तो, वो सामने ही रहते 
घर में सीधे हरकोई नही आता था 
वाकई तब घर घर थे 
बिखरे हुए, की भावों से भरे 
सारे दिन के लिए घरके अलग हिस्से होते थे यदि सुबह की आग चूल्हे में एक जगह जलती तो दुपहर को खाना दूसरी जगह बनता साँझ का चूल्हा अलग सुलगता , और ठण्ड हो, तो रात की अअंगिठी अलग सुलगती 
ये रिवाज भी था, सुविधा भी, की, घर में सुबह दोपहर , व् रात के वक़्त अलग अलग हिस्सों में आग जलती, अलाव व् अंगीठी अलग जलते, घर इतना ही बिथरा होता था , की आज भी मई घर को समेत नही पति घर की व्यवस्था ऐसी थी की, घर का काफी हिस्सा खली रहता, जिसकी हमे आदत थी घर का सहन, छापरी , सब अलग होते. कोठों में भी गौओं को सुबह शाम दोपहर को अलग थानों पर बांधते थे ये बहुत अच्छा था, उन्हें चरने घूमने भेजते, एक ग्वाला उन्हें चरता, कोठों में उन्हें दूसरा उन्हें बंधता, व् चारपानी देता, मुझे एकड़ एकाध बार बुआजी गौओं व् भैंसों को चारा देने कही होगी, मुझे लगता है, ये हमारी जिम्मेवारी है, की हम अपने घरके पशुओं की देखरेख प्यार से करे।  हमारे बाबूजी, आजतक घरकी गौओं को चारा पानी जरूर देते है, क्योंकि, अब पहले, जैसे ४ या ५ नौकर नही होते , तब हम कल्पना नही करते थे, की घर में कभी नौकर नही आये, तो हम कैसे उतने बड़े घर की झाड़ू लगाये, आजतो, सारा काम खुद ही करना है वक़्त कितना बदला है, की अब नौकर मालिक का युग वंही है, जो दौलत वाले हो 

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