Friday, 18 April 2014

बुआ जी के घर आनेवाली मेहतरानी धीरोजा, मेरी दायमा की तरह थी वो मुझे  चाहती थी, जितना 
बुआ जी मुझे चाहती थी बुआ जी , और धीरोजा मुझे कितना चाहती थी, ये बताने मेरे पास वो विस्तृत 
आकाश ही तो है 
बचपन में भी ढलती साँझ में मई विस्तृत नभ को देखती और घिरती रात को महसूस एक भय, एक आशय करता सन्नाटा , उस बड़ी सुने घर में था, जो इतना बड़ा था, की आधे से ज्यादा हिस्सा बंद रखते थे 
मेरे और बुआ जी के साथ, कोठे में बंधी गौएँ,  बैलों,व् बैंसों का तो, काफी दुरी पर बसेरा था, घर के लम्बे आँगन, बरामदे, कोठे, व् खली ढेर साडी जगह , बुआ जी का रीता जीवन, सब एक्स था, वंही से सूनापन आया हो, की उन यादों में एक रहष्य है, उन्सुल्झे प्रश्न है वे आती हुई राते, लम्बी उदास व् भय से भरी होती थी जब सब चले जाते, मई बुआजी के साथ, सामने के कक्ष में पलंग पर सोती, द्वार लग जाते, तो अक्सर उठकर कहती 
बुआ जी मेरी आँखों में जलन होती है, ये धुआं सा क्यों है 
बुआजी कहती, कहा है, धुवाँ , मई कहती बुआजी, मेरी आँखों में जलन होती है ये धुवाँ रोज लगता था 
बुआजी परेशान हो जाती थी , और ढेरसारे गीत गति, गुनगुनाती थी, तब मुझे फिर नींद आ जाती थी 
ंबहुत चाहती थी , मेरी बुआ जी मुझे 
मई उनकी बेहद लाड़ली भतीजी थी , शायद बेटी को भी वो इतना नही चाहती 
जितना उन्हें मुझसे लगाव था 
फिर मई क्यों उन्हें छोड़कर आ गयी, ये कल 
बतौनगि....... अपने जीवन के वो रहष्य भरे प्रश्थ…। 

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