ये गर्मी के दिन ,
दोपहरिया
मुझे बहुत दूर ले जाते है, जब मई लिखा करती थी
मई अकेली दोपहर भर लिखती थी रात भर लिखती थी
अपने नावेल
उसके पत्रों के साथ ही
सोती जागती थी जब मेरे साथ कोई नही था
मेरी कहानी के पात्र ही तो थे
दोपहरिया
मुझे बहुत दूर ले जाते है, जब मई लिखा करती थी
मई अकेली दोपहर भर लिखती थी रात भर लिखती थी
अपने नावेल
उसके पत्रों के साथ ही
सोती जागती थी जब मेरे साथ कोई नही था
मेरी कहानी के पात्र ही तो थे
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