Thursday, 17 April 2014

ये गर्मी के दिन ,
दोपहरिया 
मुझे बहुत दूर ले जाते है, जब मई लिखा करती थी 
मई अकेली   दोपहर भर लिखती थी रात भर लिखती थी 
अपने नावेल 
उसके पत्रों के साथ ही 
सोती जागती थी जब मेरे साथ कोई नही था 
मेरी कहानी के पात्र ही तो थे 

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