Monday, 21 April 2014

बुआ जी का पुत्र नही रहा 
बुआ जी ऐसी हो गयी की उन्हें  उठाना  था 
 सी निर्जीव  निरीह सी 
 कैसे झेल था 
भगवान बुद्ध होते  कहते 
की, वंहा से दिया जलाकर लाओ 
जन्हा मौत नही हुई हो 
किन्तु ये बहुत विकत था 
साहूकारी का धान संहार लाया था 
जिस धन में गरीबों के आंसू , खून पसीने की गंध हो 
वो, राजपाट कैसे चैन लेने देता 
बुआ जी शोक के सागर में डूब गयी थी 
किन्तु फूफा तो जी ही नही सके 
एक दूसरा पात विवाह किया गया की बीटा 
बीटा बेटा होगा ,किन्तु नही हो सका 
पुत्र के जाने के बाद फूफा पांचवें वर्ष सिधार गए 
एक साँझ सर दर्द की शिकायत हुई  पुण्यात्मा 
राजपाट छाड़कर गए 
पीछे रही, दोनों पत्नियां , नई पत्नी तो ४ वर्ष के विवाह की ही थी 
ये दुर्दिन का आरम्भ था 
बुआ ने उनकी स्टेट को संभाला 
किन्तु दुर्भाग्य ने कभी मेरी बुआ जी का दमन नही छोड़ा 
वे सम्पति संभलकर दिल बहलाती रही एक सौत थी, घर आँगन, खेत खलिहान व् गौओं के कोठे थे और 
घर की तिजोरी में साहूकारी का जेवरात था 
नकदी तो जेठ ले गए थे, किन्तु बुआ ने फिरसे वैसा ही वैभव लाया , किन्तु क्या करती कोई खर्च नही, सिर्फ आय होती थी, जाने कितने खेतों से धान आता था, कितना संभालती 
सुने घर आँगन में थी दोनों सौतन, आमने सामने खली म्यान की तलवार जैसी 
बुआ अपने पुत्र को खोकर दुखी, क़तर 
कातर और दूसरी यौवन के मद से तानी , तनी हुई 
हमेशा वो विद्रोही ही रही 
जब बड़े फूफा के यंहा जाती तो 
नवाधीन की हमेशा हंसी उड़ाते 
कहते कितना भात कहती है 
उन्हें उसके दुखों से क्या मतलब था जिसने पहले पीटीआई से विछोह के बाद दूसरा सम्पन्नं घर पाया, किन्तु 
पीटीआई सुख क्या मिलता, प्रौढ़ फूफा उसे छोड़कर चले ग्ये…व्न्ह जिसके बारे में कोई नही जनता की 
आते कहा से है और जाते कहा है 
कैसे हुई युवा नवदीन की मौत। ....... उसका सही नाम नही लिख सकी हुन… 

No comments:

Post a Comment