Wednesday, 2 April 2014

बुआ जी का घर 
जैसे हवाएं सर सर सर 
घर तो था 
जैसे आश्मान पर 
आसमान पर 
और मेरा दिमाग भी था 
कुछ आश्मान पर 
 हमेशा वंहा कुछ न कुछ खेलती 
अकेली ही खेलती 
साथी थी ,
मेरे संग प्रकृति 
और बुआजी 
साथ थी 
जैसे समूची धरती 
क्या बताऊं 
कितना सुनाऊँ 
कि वो वक्त नही 
वो , मेरा अमृत काल था 
जो, कुछ बिट गया 
कुछ मेरे भीतर 
आज भी 
जीवन के रूप में 
मौजूद है 

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