वो जो रातों का सुरूर और नूर था , एक गुरूर सा मन में था, एक दर्प चेहरे पर था वो, आँगन उजले उजले
उजियारे पक्षे कौंधते थे, ख्याल जैसे जलते आलावों की छाँव में
मेरी बुआ जी के गाँव में जलती थी, जाड़ों में जो अंगीठी उसे गुरशी कहते थे
दिन ऐसे थे, जैसे गुरुमंत्र पढ़ रहे हो रातें ऐसी थी, जैसे धमनियों में कोई मदिर सा प्रवाह झनझन बाह रहा हो
आँखे थी, निर्निमेष अधमुंदी सी निश्छल , अनजान दुनिया दारी से
वो रातें किस कदर चांदनी में धीमी सांसे लेती सुस्ताती थी बुआजी जब सुलाने कुछ गुनगुनाती थी जब, मई हल्की नींद में जागती
और बुआ जी से पूछती , ये कड़वा कसैला धुंवा मेरी आँखों में कहा से आता है तब उस बड़े वीरान घर का
रहस्य जैसे मेरी मासूम अंजानी आँखों में कुछ कह जाता था
जिसका पता मुझे सीढ़ियों पर चुड़ैल के रूप में झलका करता
और मई उस वीराने घर में चीखकर बुआ जी को पुकारा करती जबतक
बुआजी काम छोड़कर मुझे लेने नही आती
वो, चुड़ैल मुझे द्राया करती थी वो, मेरी बुआजी की मृतक सौत थी, जो उसी बरस मर गयी थी, कैसे
शेष फिर। .......
उजियारे पक्षे कौंधते थे, ख्याल जैसे जलते आलावों की छाँव में
मेरी बुआ जी के गाँव में जलती थी, जाड़ों में जो अंगीठी उसे गुरशी कहते थे
दिन ऐसे थे, जैसे गुरुमंत्र पढ़ रहे हो रातें ऐसी थी, जैसे धमनियों में कोई मदिर सा प्रवाह झनझन बाह रहा हो
आँखे थी, निर्निमेष अधमुंदी सी निश्छल , अनजान दुनिया दारी से
वो रातें किस कदर चांदनी में धीमी सांसे लेती सुस्ताती थी बुआजी जब सुलाने कुछ गुनगुनाती थी जब, मई हल्की नींद में जागती
और बुआ जी से पूछती , ये कड़वा कसैला धुंवा मेरी आँखों में कहा से आता है तब उस बड़े वीरान घर का
रहस्य जैसे मेरी मासूम अंजानी आँखों में कुछ कह जाता था
जिसका पता मुझे सीढ़ियों पर चुड़ैल के रूप में झलका करता
और मई उस वीराने घर में चीखकर बुआ जी को पुकारा करती जबतक
बुआजी काम छोड़कर मुझे लेने नही आती
वो, चुड़ैल मुझे द्राया करती थी वो, मेरी बुआजी की मृतक सौत थी, जो उसी बरस मर गयी थी, कैसे
शेष फिर। .......
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