Tuesday, 22 April 2014

बुआ जी के 
बुआ जी के घर का अकेलापन 
उनका दुर्भाग्य क्या उन्होंने चुना था 
नही ये तो उन्हें उस सम्पति के साथ मिला था 
जो, उन्हें पीटीआई के घर में मिली थी 
अतः अथाह सम्पदा और साथ में अकेले होते जाने के हालत 
बुआजी के घर मई तब आई थी जब वो पीटीआई 
पाती पति  को व् पुत्र को खो चुकी थि. जब जीवन में दुर्योग ने उन्हें तोड़ दिया था, वे बड़े फूफा के यंहा जाती थी, हमारे गाँव , जन्हा बड़ी बुआ जी उनकी जितनी थी, अर्थात एक ही घर में दोनों सगी बहनें ब्याही थी घर में जो 
धन सम्पति का सैलाब बहते आया था, वो बड़े फूफा के घर ज्यादा था, वंही वे जाती थी, वंही मेरी माँ व् पिता हम सब बहन भाईयों के साथ रहते थे 
ये तो मई कई बार बता चुकी की, मई छोटे भाई के होनेपर इधर उधर रहती, राख कहती, और , मेरी छोटी बुआ आती तो, उनकी गोदी में जाकर बहुत  , बुआजी ने मुझे संग ले जाने का फैसला किया 
बुआजी के घर थी, उनकी बूढी ननद, बुआजी उसे नहला दिया करती, फिर शायद उसकी भी मौत होगयी 
थी , बुआजी की छोटी सौत nvadhin  ये नाम यंहा सही नही लिख प् रहा है, वो थी, जिससे मई ज्यादा नही बात करती 
या वो मुझे ज्यादा नही लड़ करती।  किन्तु एक वक़्त बहुत सुबह ५ बजे का होता, जब बुआजी निवृत होने पिछवाड़े गयी होती तो, मई उठकर नवदीन के बिस्तर में चली जाती, और वो भी मुझे सुला लेती, बुआजी जब लौटती तो, कहती जागेश्वरी कहा गयी , ये ही उनके बीच का एक परिहास का पल होता था 
बुआ जी के घर नवदीन जैसी भी थी, एक साथ तो था ही, किन्तु नियति को ये भी मंजूर नही था मई स्कुल जाने लगी थी, सुकनंदन जी रामायण पढ़ने आते , मई पुरे घर में खेलती, धीरोजा संग रामलीला देखने जाति. दिन मजे में गुजर रहे थे 
नवदीन घर को लीपा करती, कामवाली व् नौकर के बावजूद घर की औरतें म्हणत व् घरके सभी काम करती, खेती के काम  को छोड़कर , किन्तु अनाज फटकना भी करती, घरमे अनाज होता, सबकी देखभाल करना नित्य का काम था, नवदीन जब खाली होती तो, वो कथड़ी सिला करती, मई ये बता दू की औरतें घर के स्वछता के अलावा अनाज के सभी कार्य करती , बुआजी चक्की में डालें ओपिस्ति, या कोई आता, जिसके कई तरह के व्यंजन बनती, त्योहारों का समय घर में व्यंजन पकवानो के बनाने का समय होता, जो सभी को बाँटना भी होता था , वाकई वो वक़्त था, जब सबके साथ जीते थे, खेती, कुदरत , प्रकृति के सामजस्य में जीवन चलता था,
सामंजस्य 
एक वक़्त का खाना नवदीन बनती थी, जब हम हमारे दूसरे गाँव जाते तो, खचर खाचर या बैलगाड़ी में जाते थे, बहुत अच्छा लगता था, नवदीन भी साथ चलती, लेकिन बड़ी बुआ जी के यभा उसे ताने सुनने होते, बड़ी बुआ की बेटियां उसपर तंज कस्ती, यंहा तक की काम वालियां भी छोटे फूफा की उस नई नवेली विधवा हो चुकी पत्नी पर व्यंग बाण चलती थि. गोरिचित्ति , बेहद सुंदर नवाधीन कैसे दांतों के बीच जीभ की तरह रहती थी, सभी की बातें सुनते हुए जीवन जिन, और जब सबको खिलाकर खाने बैठती तो, सब तने कस्ते, बातें सुनते की, नवाधीन तो, मन भर भट कहती है इतने पर भी उस विद्रोहिणी का न रूप कम होता था, न तेज, जवानी तो, जैसे सावन की नदी जैसी चढ़ी थि.... वो हरी सूती कस्ते की साडी पहनती थी, उसमे भी उसका रूप खिलता था, ऊँची गोरी, वैसा ही सौंदर्य था उसका , उतनी ही तेजस्वी थी, तेज जबान नही चलती पर, उसके तेवर कहते थे की, वो नही सहती ये बातें। …होते होते कब पीलिया की चपेट में आ गयी थी पता न्हि… दवा कोइन्हि करता, उसके मायके वाले भी डरकर रहते था 
नवाधीन शाम के पहले से सामने की छापरी में दलन में बैठी , हर आने जाने वाले को देखती.... जब हमारे घर के आँगन से गुजरते लोग पांव पटकते तो, कुछ नाराज भी होति… जाने नवदीन कौन सा सौभाग्य लिखके आई थी, की उसे पीलिया हो गया , और उस बरस वो, अपने पीहर गयी थी, हर साल ही जाती थी, किन्तु नवाधीन उस बरस गर्मी से गयी तो, नही लौटि. बुआजी ने भी खोज खबर नही ली , की कैसी है नवाधीन को ज्यादा भात खाने से पीलिया हो गया था, बड़ी बहन जीजा के घर रही, कुछ देशी दवा हुई हो, किन्तु मनके संताप का इलाज नही था , और फिर बरसात लग गयी थी, पहली बारिश होने लगी थी, बुआजी को नवाधीन की याद आती तो, वो बेचैन हो जाती थी, सौत थी, लड़ती भी थी, पर घर में उसका आसरा था, घर की भीतरी ककस में वो  रहती थी, उसकी खत व् बिस्तर वैसा ही वंहा पड़ा था,सब आते तो आँगन में बैठे देरतक बातें करते।  बुआजी से पूछते , बाई, वो आई क्यों नही जी , बुआ जी क्या जवाब देती, सुनी आूँखों से राह देखती , बारिश के संग मनमे तूफ़ान उठा करता, सबकी बीती बातें याद आती थी , बुआजी की आँखे तब सबकी यादकर भींग जाती थी, सब एक एककरके जा रहे थे मई चुपचाप उनकी गोदी में सा जाती, बुआजी को देर रात्ततक नींद नही आती थी, दुर्भाग्य और मौत का झंझवत फिरसे आय....vo बरसात तूफानी थी, कैसे हरहर मेघ बरसता था, 
और फिर नवाधीन की मौत की खबर आई थी,.... सबकुछ बुआजी के हथेली से रेट की तरह से फिसल गया था, ये बहुत दारुण दुःख था, बुआजी ने कैसे झेल होगा, उस ह्रदयविदारक खबर को.... ये दुर्भागय तू किसी को मत मिलन.... हे ईश्वर,,,, तुम सबको सुख दो.... 

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