Wednesday, 23 April 2014

वो घर वो संसार 
सब बिट गया 
ये समय वो नही है सब कुछ तो बदल गया है किन्तु मेरी स्मृति में आज भी नवाधीन है वो, चली गयी थी, उस बरस अपने पीहर, वंहा से अपने दुर्योग से मुक्ति के लिए चली गयी थी , अपनी बड़ी बहन के यंहा, वो गाँवों का शांत जीवन, जन्हा होते है , पांव पांव चलने के के जज्बात, बुआ जी ने, अपनी सौत को छोटी बहन नही समझा होगा, किन्तु, नवदीन की मौजूदगी घर में बहुत सहारा थी, घर को लिपटी ही नही, एक वक़्त का खाना बनती थी, और सामने की छापरी में रहती, बीच के कक्ष में सोती थी, जन्हा तिजोरी का कमरा था, जन्हा से पतन की सीढियाँ थी, नवदीन ने तो मुक्ति प् ली थी, वो इतनी आसानी से चली गयी की , बुआजी सकते में रह गयी, बुआ तो इन्ही सोचती थी, की नवदीन तो हिस्से की हक़दार है, सब कुछ खोकर भी धन से इतना मोह। ....ओह.बउअजइअकएऌइऋअहगयइ 
ये तुम.... क्या है बताओ, क्या कहोगी , चिड़ाने की नई तरकीब देखो। । 
तो, उस बरस बारिश लग गयी थी, बुआ जी देखा करती थी, नवदीन के लौटने की राह, सब आँगन में बैठे, उसीकी बातें करते थे , ढलती साँझ भी तो उदास हो जाती थी, की वो नही लौटेगी, जिसने कम उम्र में देखे थे, जाने कितने अनजाने दुःख ,,,.... और फिर उसके न रहने की खबर लेकर ए थे, गांव से कोई, शायद नवदीन के भाई। ।न्वदिन उनकी छोटी बहन थी, बड़े घर में पात का ब्याह होकर गयी थी 
नवदीन नही रही, ये खबर सारे गांव में फ़ैल गयी, पुरे मोहल्ले वाले आकर जमा हो गए थे, बुआजी को सभी सांत्वना दे रहे थे, बुआजी प्रारब्ध के इस मजाक पर हताश थी, नवदीन ने ये कैसा बदला लिया था, वो विद्रोहिणी आखिर चली गयी, वीतरागी, ने कभी धन पर हक़ नही जताया, कुछ माँगा नही, वो तो, अपने होने का अहसास भर करती थी
मई बुआ जी के संग उस गांव तक गयी थी, बुआ जी ने सबसे बीड़ा ली थी, वंहा जाकर फिर ढलती साँझ थी, और बुआजी, ने उसे चित की अनुमति दी थी, सुपरडे खाक होने के पहले वो, सब कुछ बुआजी को सौंप गयी, नही जताया उसने कोई हक़, तिरहित जैसी आई थी, वैसी ही गयी 
बुआ जी की आँखें भीगी थी, कांपते हाथो से उसके माथे पर गुलाल लगाकर बिदाई दी थी, और लैयत आई थी, बुआ जी मुझे लेकर अगले दिन अपरान्ह तक, नौकर गाडी लेकर नही आया तो, हम पिपरझरी से पैदल आये थे , बुआजी की थकी सुस्त चल....ek एक कर घरके सभी चले गए थे , और। .... और मई बोली थी, बाई अब वो नही आएगी क्या 
बुआ जी से मैंने पुछि थी, वो कहा चली गयी , फुआ बै… 
तो, वे बोली थी, की वो उसके गाँव के जंगल में गम रही होगी.... मई आजभी सोचती हु, की कोई जाता है, तो कहा चला जाता हा, कहा गम हो जाता है, ये शरीर कहा जाता है। । कभी मई भी बेटे से छिड़कर कहती हूँ, तुम मेरे जीते जी कुछ नही करोगे उसे कहती हु, मेरे मरने के बाद सब करना, अपने धर्म को मन्न… 
जब मई नही रहूंगी, तो किस्से गुस्सा करोगे। । और बेटे से कहती हूँ, की मई मुंबई से मरने पर ही लौटूंगी, अब इन्ही संघर्ष करूंगी.... 
तो, नवदीन के जंगल में जाने की बात मैंने मान ली, फिर बुआ जी से सवाल नही की, मुझे पता था, वो जंगल में चली गयी है 
फिर, सब बुआजी को घेरकर बैठ गए थे, आँगन में ढलती साँझ में बुआजी ने सबके साथ नवदीन की ही बातें कर रहे थे, सबको इन्ही लग रहा था, की वो अभी बिचके कमरे से निकलकर आएगी , वंही ऊँची गोरी, वद्रोही , अपने रूप पर दुर्भाग्य को हावी नही होने देनेवाली नवदीन। … लेकिन वो लौटी भी तो, चुड़ैल ब्नके… और मुझे कब डरने लगी, ये धीरे धीरे कुछ माह बाद पता चला, किसीको नही वो बीच कमरे में मुझे दिखती थी,
वो बरस फिर तेज घटनाक्रम में गुजरा थ.... 

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