Friday, 18 April 2014

बुआ जी के मीठे मधुर गीत 
उनकी आवाज गूंजती थी 
उस रातों में जन्हा वीराने थे सूनापन था 
दुखके गहरे साये थे आत्मिक सात्विकता थी किसीकी गुलामी नही थी कोई गाली 
गलौज की भाषा नही थी , हम सब थे, प्रेम व् आत्मीयता के रेशों में बंधे 
निस्वार्थ, बिना एक  चाहते , एक दूसरे का साथ निभाते, सभी के पास अपने लायक घर थे, वो मिटटी की 
मोती दीवारों के घर, शीतल छाँव वाले घर, जन्हा सूरज चाँद अपना, डेरा डालते, धुप छाँव का डेरा होता, जन्हा रात और दिन आते जाते थे, चरवाहे की तरह, उनके अँधेरे उजाले साथी थे, उनींदी रातें, कुछ कहती थी, सबकुछ लयबद्ध था, और , संगीत था, जो जलतरंग की तरह, आत्मा में निनाद करता, उतरता रहता, एक मधुरतम रिश्ते की तरह उन दिनों से मेरा गहरा आत्मीय लगाव थ…।वो गीत जो बुआजी गाती थि.... कल बताउंगी, उन्गितों के बोलों को। 

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