Saturday, 31 May 2014

ज्यों 
ज्यों ज्यों जाने के दिन नजदीक आ रहे है 
मैंने संघर्ष बंद कर दिया है खुदको  किताबों की दुनिया से ही जोडूंगी 
मेरी किताबें छाप रही है इतना ही बहुत है 
आने जाने के इस खेल मेमे मुझे जिंदगी उदास कर देती है 
किन्तु खुश रहना है , उदाश नही 
आज दिनभर आयशा भी बिल्डिंग में नही है, वो एक स्व बरस की बच्ची है जो , उसकी मम्मी के 
ऑफिस जाने पर सारा वक़्त सबके साथ खेलती है, उसकी नानी दुबई से आई थी , शायद जाने वाली थी 
इश्लीए मेहमानों का अनजाना रहा , आज वंहा सुना है 
इन्ही तो जिंदगी है , जन्हा आज मेले लगते है 
कल वंहा सुनसान लगता है 
मौसम बदलते है 

Mohabbat Karne' Wale',Kum Na Hon Ge'...!!!

Friday, 30 May 2014

सच्चाई ये है की मुंबई में अपना काम ही अपना होता है 
यदि आपके पास अकपका काम नही हो तो 
समझो आपका यंहा कोई नाम लेवा नही 
एक पागल लड़की यंहा पर भीख मांगती है इन्ही सो भी जाती है ये उसका रोजगार है जब आपका रोजगार हो तभी आप कंही रह सकते है 
पहले  की सिनेमा के गानों से बिगड़ जाते है 
सिनेमा का शौक आपको कंही ले जा सकता है 
मुझे देखने का नही बनाने का शौक लगा 
किन्तु लिए बहुत पैसा चाहिए 
बरसो
बरसों पहले 
और आज भी मुंबई 
उतनी ही बेदिल है 
मेरे लिए यंहा 
कोई जगह तब भी नही थी 
आजभी नही है 
जीविका 
व् जीवन का संघर्ष 
करना ही होगा 
इससे कोई नही बच सकता 

आप कितनी भी कविता कर लो 
कंही किसी बालिका की इज्जत लुटती है 
कोई स्त्री मारी जाती है 
उसका जीवन शव बन जाता है 
तब कविता भी बेमानी हो जाती है 
दुःख सभी के है 

Wednesday, 28 May 2014

जी हाँ नई किताब लिख रही हु अपने प्रकाशक से बात की है देखे कितना वक़्त लगेगा, यानि की समय लगता है 
इसके पूर्व पार्इज्जत को ९ दिन में पूरा की थी,
ये बहुत उपयोगी किताब है , जो आपके मेरे जीविका के संघर्ष पर है पारिजात का काम तेजी से चल रहा है इसे मई बनारस यूनिवर्सिटी की दें मानती हूँ 
आज ताप्ती दोपहरी में लौटी , एक दिन और संघर्ष का गुजरा है इस बार ५ माह में लौट रही हूँ, एक गण बनाकर ुतुब युटुब पर डाला है, इससे ज्यादा और कुछ नही , ये संघर्ष है, जबतक परिचय नही होगा , कुछ नही होता, इश्लीए यंहा आये तो, तयारी से आये , आपके पास धन हो किन्तु, यंहा मन से नही टन से भी संघर्ष होता है, 
मेरा पहनावा साडी है, किन्तु मुझे पंजाबी सूट पहनना चाहिए , और भी सुधर की गुंजाईश है , बात ये है, की जिसका बीटा बीटा पुत्र बीमार रहा हो , उसका संघर्ष सघन रहा हो, वो अचानक क्या बदले , घहरी निराशा ने मुझे झिंजोड़ दिया है , मई आज अनिल शर्मा के यंहा नावेल दे आई 
और अपने प्रकाशक से बात की हूँ, की 
मई अपने जीवट भरे संघर्ष पर किताब लिखूंगी शायद वो आजसे ही शुरू हो , ताकि इस लाइन में लड़कियां सोच समझकर आये हां, लड़कियों को उतनी कठिनाई नही जा सकती , मेरा आत्मविश्वास कम नही हुआ है, किन्तु जैसा देश वैसा भेष न हो तो, सफलता बिना पहचान के नही मिलती 

Tuesday, 27 May 2014

कल मई साँझ में सोकर उठी , दिन डूबता ही थकी सो गयी थी, नींद टूटी , तो दिन डूब रहा था, कमरे में हल्का अँधेरा, पर सूरज का उजाला धुंधला होता हुआ , मई सोचने लगी की, ये गर्मी की जाती हुई शाम है, मौसम का संधिकाल है , गुजरते मौसम का , और दिन ढलने का वक़्त, अजीब सी रिक्तता भर गयी , फिर जाने कैसे एकदम से बुआ जी याद आई , लगा बुआ जी अपने घर में गुजरते गर्मी के मौसम में छाप[ऋ में बैठी है , दलन में वो, सामने कोई तरबूज कटा हुआ लेकर बैठी , मेरे आने की राह देख रही है , इन्ही उनकी, मुद्रा जब वो, सहज बैठी होती, कंधे पर आँचल होता, सर के स्वेत केश बिखरे से होते, वे मुश्किल से ही कंघी करती थी, पीटीआई व् बेटे के जाने के बाद उन्होंने कुछ उम्र के बीतने पर साज श्रृंगार छोड़ दिया था, ढलती उम्र, उदाशि पर, चेहरे पर वंही गौरव व् तेज , शायद सम्पन्नता की वजह से, क्योंकि जीवन का दुःख पर, जीविका की चिंता नही बुआ जी की याद से मन बहुत ही टिकट हो गया। वो, बहुत ही विकट वक़्त था , किन्तु बिट ग्य… मई फिरसे नई जगह जाउंगी, जीवन कहा कहा ले जाता है, किन्तु , मन वंही रह जाता है , जन्हा से बचपन बिता था, तभी तो कल बुआजी थाली में तरबूज लिए याद आ गयी , मुझे वे अपने हाथों से खिलाती थी। ।आज्त्क उनके हाथ से बनाई व् खिलाई रोटी , ययद आती है, बहुत मीठी स्मृति। ……। 

Sunday, 25 May 2014

वक़्त
वक़्त 
तुम 
तुम 
वक़्त वक़्त कभी रुकता नही है ,  ,जो भगति रहती है , आप 
 आज मई आपसे अपने लेखन लेखन के अनुभव बता रही हूँ,
अभी मेरी  डेल्ही प्रेस से तीन  रचनाएँ स्वीकृत ,  मैंने सोची की 
मुझे पैसे मिलेंगे ,  चेक जो भेजे गए  नही पहुंचे , तुम 
तो , मुझे समझमे आया  बिना जुगाड़मेंट के पैसा नही मिलता ,
 पहचान नही है , आप जॉब देखिये ,  आपको जुगाड़मेंट लगाना होगा 
 काम जो किया उसका पैसा  आना बहुत मुश्किल है 
मई  इन्ही कहना चाहती हूँ ,की   कविता करे ,  आर्थिक आधार जरूर देखे 
 तभी सच होंगे , सपने जब  आपका सुपोर्ट होगा ,  नौकरी या व्यव्शाय  
फिर अपने कला का शौक भी  
१५ जून को मुंबई से चली जाउंगी 
फिर जनवरी १५ में लौटूंगी 
घर बन  चूका है, लगभग 
वंहा सबकुछ जमाना है 
बेटे को उसके शिक्षा के काम से 
व् घर-गृहस्थी से लगाना है 
बीटाबीटा पुत्र अपने जीवन से लग जाये तो फिर 
बनारस जाकर गंगा स्नान कर आउन 
फिर अपने सपनों का पीछा करना है 
जीवन भर भागते थक गयी हूँ 
कुछ पल ठहरकर बीते जीवन को 
पलटकर देखना चाहती हु 
और बहुत सा ब्लॉग लिखना है 
जीवन इतना ही तो है 
लिखने तक, लिखने की यात्रा 






Saturday, 24 May 2014

माँ है 
वंहा उस आँगन में 
अपनी टूटी टांग के दर्द सहती 
दुखती रागों में जीती 
दुखते दांतों में मुस्कराती 
हिलती गर्दन को संभालती माँ 
फ़टे पुराने कपड़ों में भी 
जर्जर होकर भी 
अपने भक्ति के ओज से 
तेजस्वी माँ नही गाती भजन 
पर बिसरे भजनों को मन में 
याद करती माँ 
मेरी चिट्ठी पर विणहस्ति माँ 
तुम आँगन के भीतर 
ढलती हुई साँझ की 
गुलाबी धुप हो 
जो, सूरज के आस्त होने के पूर्व 
आँगन में रश्मिओं संग छितरी हो 
माँ तुम्हारा ख्याल 
सारे गाँव ही नही 
उस संस्कृति को भी 
स्मरण करता है 
जो त्याग तपस्या से 
सींची गयी थी जन्हा गीत भी 
संध्या को उड़ते पखेरुओं साथ 
याद आते थे 
माँ मेरा इन्तजार करती है 
जाने क्यों 
माँ की आँखों की चमक 
मेरे ख्यालों में मुझे इन्ही कहती है 

Thursday, 22 May 2014

Desi Funk

Desi Funk

Desi Funk

मुझे माँ याद आती है 
और बहुत  है जो, प्रतिपल 
हमसबकी याद करती है 
छापरी में पसरे सन्नाटे में बैठी माँ कोई बिसरा भजन 
यादकर गुनगुनाती है 
बीते वक़्त को याद करती है 
माँ बहुत याद आती है 
जब घर की परछाई 
घर के आँगन में पड़ती है 
चिड़िया कलरव करती है 
साँझ आँगन से 
पेड़ के झुरमुटों से गुजरती है 
और सूरज की तपन उतरती है 
माँ घर के आँगन में 
उचट सी नज़र डालती है 
देखती है, सुने आँगन को सुनी बिसूरती आँखों से 
माँ बहुत याद आती है 
की हम सब 
माँ के आँगन से निकलकर 
अपने जीवन में जुटे है 

Saturday, 17 May 2014

aaj kal yaad kuch aur rehta nahin

Aa laut ke aaja mere meet Mukesh Film Rani Roopmati (1957) Music SN Trip...

तेरा छुट्टियों
तेरा छुट्टियों में वो ताशपत्ती खेलना 
और दिन भर कच्ची अमिया खाना जब माँ 
और दादी डांटें तो तेरी बेलौस मुस्कराहट नटखट 
दूसरों को खीजकर हंसती है , क्यों 
लिखने में थकावट महसूस हो रही है 
तू जो साथ नही है 
यंहा कुछ घिनौने  
 मेरे बेटे  में जिन्हे गलती दिखती है 
ऐसे  लोग लोग मुझे  पसंद नही आते 
मेरे   

Friday, 16 May 2014

मेरे बुआ जी के गांव को कोना कोना स्मृतियों में बसा है हम हट्टा गांव के बड़े बाड़े में जाते थे, वो एक रियासत का कई बाड़ों का अहाता था, वंहा बाहरी अहाते, योन कहे गलियारे में थी, बावड़ी , वंही पास में था मंदिर, स्वेत मंदिर, और उसके कंगूरे, जन्हा प्रांगण में हम खेलते थे , सभी सहेलियां दौड़कर चियाचे छियाछै खेलते थे, वंही पेड़ थे, जिनसे जो सूखे फल गिरते, उनसे हम वंही फर्श पर बैठकर भौंरे खेलते, कितना मस्त लगता था, जब लौटते तो, मंदिर हमारे मानस में खुशियां बिखरता, हमारे चेहरों पर उल्लाश व् परितृप्ति फ़ैल जाती थी , आज भी मेरी स्मृति में वो मंदिर दमकता रहता है, अपने यशश्वी गौरव के साथ। । 

Wednesday, 14 May 2014

आँगन आज भि सँजोए कि जरुरत है , जंहा हम मन कि बात कह सके , बिन लागलपेट के लेकिन , एसे भि नहीँ कि किसि के दिल को लग़ जाएं , आज मै गॉंव लौत रहि हु, वनः से बेते बेते पुत्र क विवह सम्पन्न क्रैकर 
कराकर फिरसे लौटूंगी, मुंबई मेरे सपनों क षहर जो है , सपनो का शह्र षहर , जो भि है, सती कीती सिटि 
मुझे तकलीफ तो होती है, किन्तु बर बर , बार बार शहर बदलने मे , पुत्र को इन्हा पसन्द नहि , तो उस्से जबरदसती नही करंगी, वरण वो फ़िर बमर हो जायेगा तो, न्ही संभल सक्ति 
मुझे ज्ञात है, कि आँगन क हमे इँतजार होत है, 
आपको भी, मुझे भि मै दरअसल उस आंगण मे बर बर लौटतीं हु, 
जो सुरक्षित थ था, जो क्यारियों से घिर थ, जंह बोगनवोलिया और चम्पाकली कि लताएँ झूंठी थि, लॉ लॉ फ़ुल गृहम मे खिलती थे , चमेली क पेढ छितर जाते थ, और सेवती व मंगरे कि क्लियो से खूश्बू कि बाहरे चलतीं गरमि मे भि कितने प्यार स्मान होत थ, थोड़े बाहार निकलू , घर को सडक से जोडता एक पुल बाबूजी ने बनवायी थे, णाल प्र पुल , नाले प्र पुल है, और समने से एक पककी सडक़ जति है, मेर घर व अनजान एस कि मुझे लिखने कि समग्री देत, कुछ पेढ होते है जो सड़क किनारे है, बोगनवोलिया, और नईम नीं, ऊसी नईं प्र सुरज ड़ालते हि , ड़ालते  ,चन्दर्मा निकलता है, लगता है, जैसे नीं कि ओत चन्दर्मा बीहर क्र रह है, समय कि सिमा है , शब्द चित्र नहीँ दिख पा राही हूँ, ज्ब बहुत बढ़ा चन्दर्मा नमन्दिर के कंगूरे से निकलेगा आज, तो तुम बहुत याद आन , मन्दिर टक आ जन, चन्दर्मा को अर्ध्या तो, आप घर मे हि कर देती हो,
आज चन्द्रमा क निकलना कोइ संजोग न्हि है। …य़े चन्द्र दर्शन भि जोंग है 

Tuesday, 13 May 2014

आज बहुत थकी हूँ 
चुनाव के पूर्व सभी खामोश है 
वे लहरें बोल रही है 
जिन्होंने गौ वंश क क्रंदन देखा 
और सागर गौ वंश के रुधिर से 
लाल होता रह 
बस वंही शोर मचा रह है 
गौ वंश कि हत्या क्र जो 
पार्टी क्र निर्ल्लज हंशी हस्ति रहे 
 जगह से 
जब किसी जगह से दुर होते है तो 
उसका आकर्षण ज्यादा हो जाता है 
मुंबई में गांव क व गांव मे मुंबई क का 
आकर्षण है 
आज ज्यादा लिखने क म्न न्हि है 
चुनाव पूर्व कि खोमोशी है 

Monday, 12 May 2014


ये जो धीमी सिंदूरी साँझ उत्तरि है, ये जो प्रणयी जोड़ें आपस मे करीब सीमत आये है 
मुझे गांव कि वो शाम याद आ रही है , जब हम गांव मे होते थे 
गांव, सुदूर पूर्व क मेर गॉँव , पिपल कि छॉंव , महँ कि मदमाती महक, आउर 
और लहकते पॉंव, उमगते भव....esa सुहाना अपना स मेर गांव। … वंहा कि यादें ओह.... मई बाबूजी के गांव मे लौटी थी , बउआ जि के गॉँव से, आपने ग्यारहवें वर्ष मे , बुआ के इन्हा दर्ज , दर दार ग्यी थि, means fear
लौटके रोइ थि, बउआ जि को यादकर रोति थि, उन्हे बहुत मिस करतीं थि, उधर बउआ जि मुझे याद क्र रोति थि , कोइ नहीँ थ, जो इस हालत को सम्भल्तंएर मेर मेरा गॉँव अब बाबजी क गॉंव थ, जन्हाँ मै आपने घरकी सॅमने कि पार प्र षाम को आकेली बैठतीं, तो मेरे दोनो छ्होटे भाई मुझ्से कहनी सुनने कह्ते , मै रोज उन्हे आपने माँस मनसे हि कहनी कहानि सुनतीं थि,.... 
वो, दिन वो शाम धीमे से खिसके, रोना क्म हुअ, फ़िर आठवण मे ही थावे आठवी मे हि रेडिओ सुनतीं, व नोवल भि पड़ती, पहली घर के रमायण व सुशीला जैसि आदर्श किताबेँ, …बद्मे जब आगे कि कलास मे पहुंचि तो, गुलशन नन्द , रत्नू व प्रेम बाजपई के नोवल पडने लग़ी थि, इन्हीँ से साहीत्य से साबका हुअ। 

kashti ka khamosh safar hai.......Kishore Kumar/ Sudha Malhotra

वो दिन 
जब बुआ जि के घर से 
बाबूजी के घर तक कि यात्रा 
बैलगाड़ी से होती थी 
सुबह अलसुबह उठकर 
मुंह हाथ धोकर 
उस बैलगाड़ी मे बुआ के सांग बैठना 
जिसे घर क नौकर 
इतनी ही सुबह आकर फांदता 
हम तीनों चुपचाप सुबह के मुनह अँधेरे 
चले जाते चुपचाप दुर तक 
रास्ता भी खोमोशी से गुजरता थ था 
फिर एक एस एसा ऐसा 
सरोवर आता 
जन्हा उगते सूर्य कि किरणें झलकती 
रश्मियाँ लहरों मे किल्लोल करतीं 
वंहा सारस के जोडे नज़्र आते थे 
वो, गर्मी के अन्त के दिन होते 
वर्ष वर्षा के आगमन क आग़ाज  होता थ था 
आकाश में छाने वाले मेघों को देखकर। …। 
किसी शायर ने क्य 
क्या खूब लिखा है 
मई रोया प्रदेष मे 
भीगा मा क पयार 

Sunday, 11 May 2014

बुआ जी मेरी मा हि थि, संगी मा भि कह्ती थि, 
तेरी माँ तो तेरी फुआ बै है 
ये मा क वयंग होत 
होता किन्तु सत्य थ 
सच था ये, बुआ जि ने मुझे कैसे रातों मे जागकर 
कंधों प्र मुझे रखकर त्तब वो , रातोँ मे आपने घर के सहन मे डलती घूंटी थि 
घूमती थी, जब मुझे दो बरस कि उम्र मे गरमि धुप के फ़ोडे हो जाते थे, मै आम चुस्ती और 
बदले में मुझे बदन प्र घंघोड़े गांव कि भाषा मे कह्ते थे , वो निकलतें, मै रातोँ मे रिर्याति , सो नहीँ पति थी 
सो नहीं पाती थी , बुआ जि मुझे कांधों प्र मेर सिर रखे गोद मे घूमती, वे भि नहीँ सोतई थि,
और जब मेरी शादी हो गई तो, उन्हे तब बेहद दुख हुआ जब मेर अस्तव्यस्त जिवन मे अंधी तूफां आये 
मेरे दुख उन्हे दुखी करते थे, हमेशा मेरे लिये वे कितने जतन करतीं थी एक बर वे बेतूल मुझे देखने मेरे भाई भाभी को लेकर आयी थी, मै पहली बर मा के गॉँव से इतनि दुर थि, वे बहुत याद कृति थि, म्न नहीँ मान तो, देख्ने आ गए थि 
उनकी आँखों कि ख़ुशी व तृप्ति मुझे याद है, जब बालाघाट मे मै स्कल स्कुल से लौटीं तो, बुआ  गांव से आये देखतीं तो, मै खुशि से कहति , बउआ जि, और उनकि आँखेँ मुझे देख भींग जाति थी, बउआ जि कि आंखो मे जो खुशि के आंसू झलकते थे, वो आज भि मुझे ज्यदा याद एते है,
समझमे आता है, कि औलाद के लिये मा हो य बउआ, उनकी कलेजी मे कैसि हुक सि उठतीं है बउआ जि तुम जंह भि हो,मै तुमहरि मंता कि कर्जदार हु.... 

Saturday, 10 May 2014

बहुत कठिन थ 
बहुत मुश्किल दौर थथा 
मुझे यंहा पल पल 
कदम कदम प्र संघर्श करणा थ 
वो, बातें सुन्नी थी जो , हं 
हम घर मे नही सुनते 
ये कर्मक्षेत्र है 
यंहा अकारण भि बातेँ सन्नी होति है ]
यंहा आपके सीधेपन को कोइ भि 
हंसी व मखौल क कारन बङा स्कता है रोज आपसी कोइ युं हि 
कहेगा कि हाँ वो आपको सुनेगे 
आप नामी हस्ती न्हि है 
तो, आपके पीछे कोइ नही होगा 
जो, नामी है 
उन्हें भी यंहा काम नही है अपने काम को सामने लेन 
लाने लोग क्य न्हि करती क्योंकि 
एक फिल्म करोड़ों मे बण्टी है 
कोई आपकी कहानी प्र 
करोड़ों क्यों फुकेगा \
अभी तो, काम कि शुरुआत भि नहीँ हुए 
और मेरा बेटा मुझे वापस ले जा रहा 
क्योंकि मेरे बेटे को पसंद नहि कि मै 
कुछ करूँ 
औरतों को घर कि सुरक्षा कि 
ये गुलामी व प्रतिरोध साहन होत है आपको आपने सपनें कुचलने देने होते है 
अपनों के पांवों तले 
क्योंकि, आप अपनों के सपनो को संभालना चाहते है 

Friday, 9 May 2014

उम्र के इस पड़ाव प्र मैने संघर्ष किय है 
संघर्ष किया है तो इश्लीए कि मेरे सँग राही 
मेरे घर गाँव व बेटे कि शक्ति 
उम्र के इस छोर प्र पार मेर मेरा मुंबई आना 
किसीको नही पसन्द था 
फिरभी मैने अवसर लिय लिया 
मेरा बेटा नही सामंजस्य क्र सका इन्हा 
और बेटे के ठीक होते हि 
वो, गाँव लौटना चाहता है 
मेरे पास है , मेरे साहित्य कि दुनीया 
कंही भि सामंजस्य न्हि क्र पणे कि वज्ह 
माँ के जो प्रतीक्षा के भव है 
वो ब्लॉग मे नही समाते 
चाहती हु एक अलग से किताब लिखू 

Thursday, 8 May 2014

माँ हर पल हम सबकी रह तकती