माँ है
वंहा उस आँगन में
अपनी टूटी टांग के दर्द सहती
दुखती रागों में जीती
दुखते दांतों में मुस्कराती
हिलती गर्दन को संभालती माँ
फ़टे पुराने कपड़ों में भी
जर्जर होकर भी
अपने भक्ति के ओज से
तेजस्वी माँ नही गाती भजन
पर बिसरे भजनों को मन में
याद करती माँ
मेरी चिट्ठी पर विणहस्ति माँ
तुम आँगन के भीतर
ढलती हुई साँझ की
गुलाबी धुप हो
जो, सूरज के आस्त होने के पूर्व
आँगन में रश्मिओं संग छितरी हो
माँ तुम्हारा ख्याल
सारे गाँव ही नही
उस संस्कृति को भी
स्मरण करता है
जो त्याग तपस्या से
सींची गयी थी जन्हा गीत भी
संध्या को उड़ते पखेरुओं साथ
याद आते थे
माँ मेरा इन्तजार करती है
जाने क्यों
माँ की आँखों की चमक
मेरे ख्यालों में मुझे इन्ही कहती है
वंहा उस आँगन में
अपनी टूटी टांग के दर्द सहती
दुखती रागों में जीती
दुखते दांतों में मुस्कराती
हिलती गर्दन को संभालती माँ
फ़टे पुराने कपड़ों में भी
जर्जर होकर भी
अपने भक्ति के ओज से
तेजस्वी माँ नही गाती भजन
पर बिसरे भजनों को मन में
याद करती माँ
मेरी चिट्ठी पर विणहस्ति माँ
तुम आँगन के भीतर
ढलती हुई साँझ की
गुलाबी धुप हो
जो, सूरज के आस्त होने के पूर्व
आँगन में रश्मिओं संग छितरी हो
माँ तुम्हारा ख्याल
सारे गाँव ही नही
उस संस्कृति को भी
स्मरण करता है
जो त्याग तपस्या से
सींची गयी थी जन्हा गीत भी
संध्या को उड़ते पखेरुओं साथ
याद आते थे
माँ मेरा इन्तजार करती है
जाने क्यों
माँ की आँखों की चमक
मेरे ख्यालों में मुझे इन्ही कहती है
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