Saturday, 24 May 2014

माँ है 
वंहा उस आँगन में 
अपनी टूटी टांग के दर्द सहती 
दुखती रागों में जीती 
दुखते दांतों में मुस्कराती 
हिलती गर्दन को संभालती माँ 
फ़टे पुराने कपड़ों में भी 
जर्जर होकर भी 
अपने भक्ति के ओज से 
तेजस्वी माँ नही गाती भजन 
पर बिसरे भजनों को मन में 
याद करती माँ 
मेरी चिट्ठी पर विणहस्ति माँ 
तुम आँगन के भीतर 
ढलती हुई साँझ की 
गुलाबी धुप हो 
जो, सूरज के आस्त होने के पूर्व 
आँगन में रश्मिओं संग छितरी हो 
माँ तुम्हारा ख्याल 
सारे गाँव ही नही 
उस संस्कृति को भी 
स्मरण करता है 
जो त्याग तपस्या से 
सींची गयी थी जन्हा गीत भी 
संध्या को उड़ते पखेरुओं साथ 
याद आते थे 
माँ मेरा इन्तजार करती है 
जाने क्यों 
माँ की आँखों की चमक 
मेरे ख्यालों में मुझे इन्ही कहती है 

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