Wednesday, 14 May 2014

मुझे ज्ञात है, कि आँगन क हमे इँतजार होत है, 
आपको भी, मुझे भि मै दरअसल उस आंगण मे बर बर लौटतीं हु, 
जो सुरक्षित थ था, जो क्यारियों से घिर थ, जंह बोगनवोलिया और चम्पाकली कि लताएँ झूंठी थि, लॉ लॉ फ़ुल गृहम मे खिलती थे , चमेली क पेढ छितर जाते थ, और सेवती व मंगरे कि क्लियो से खूश्बू कि बाहरे चलतीं गरमि मे भि कितने प्यार स्मान होत थ, थोड़े बाहार निकलू , घर को सडक से जोडता एक पुल बाबूजी ने बनवायी थे, णाल प्र पुल , नाले प्र पुल है, और समने से एक पककी सडक़ जति है, मेर घर व अनजान एस कि मुझे लिखने कि समग्री देत, कुछ पेढ होते है जो सड़क किनारे है, बोगनवोलिया, और नईम नीं, ऊसी नईं प्र सुरज ड़ालते हि , ड़ालते  ,चन्दर्मा निकलता है, लगता है, जैसे नीं कि ओत चन्दर्मा बीहर क्र रह है, समय कि सिमा है , शब्द चित्र नहीँ दिख पा राही हूँ, ज्ब बहुत बढ़ा चन्दर्मा नमन्दिर के कंगूरे से निकलेगा आज, तो तुम बहुत याद आन , मन्दिर टक आ जन, चन्दर्मा को अर्ध्या तो, आप घर मे हि कर देती हो,
आज चन्द्रमा क निकलना कोइ संजोग न्हि है। …य़े चन्द्र दर्शन भि जोंग है 

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