Thursday, 22 May 2014

मुझे माँ याद आती है 
और बहुत  है जो, प्रतिपल 
हमसबकी याद करती है 
छापरी में पसरे सन्नाटे में बैठी माँ कोई बिसरा भजन 
यादकर गुनगुनाती है 
बीते वक़्त को याद करती है 
माँ बहुत याद आती है 
जब घर की परछाई 
घर के आँगन में पड़ती है 
चिड़िया कलरव करती है 
साँझ आँगन से 
पेड़ के झुरमुटों से गुजरती है 
और सूरज की तपन उतरती है 
माँ घर के आँगन में 
उचट सी नज़र डालती है 
देखती है, सुने आँगन को सुनी बिसूरती आँखों से 
माँ बहुत याद आती है 
की हम सब 
माँ के आँगन से निकलकर 
अपने जीवन में जुटे है 

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