Wednesday, 14 May 2014

आँगन आज भि सँजोए कि जरुरत है , जंहा हम मन कि बात कह सके , बिन लागलपेट के लेकिन , एसे भि नहीँ कि किसि के दिल को लग़ जाएं , आज मै गॉंव लौत रहि हु, वनः से बेते बेते पुत्र क विवह सम्पन्न क्रैकर 
कराकर फिरसे लौटूंगी, मुंबई मेरे सपनों क षहर जो है , सपनो का शह्र षहर , जो भि है, सती कीती सिटि 
मुझे तकलीफ तो होती है, किन्तु बर बर , बार बार शहर बदलने मे , पुत्र को इन्हा पसन्द नहि , तो उस्से जबरदसती नही करंगी, वरण वो फ़िर बमर हो जायेगा तो, न्ही संभल सक्ति 

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