Sunday, 11 May 2014

बुआ जी मेरी मा हि थि, संगी मा भि कह्ती थि, 
तेरी माँ तो तेरी फुआ बै है 
ये मा क वयंग होत 
होता किन्तु सत्य थ 
सच था ये, बुआ जि ने मुझे कैसे रातों मे जागकर 
कंधों प्र मुझे रखकर त्तब वो , रातोँ मे आपने घर के सहन मे डलती घूंटी थि 
घूमती थी, जब मुझे दो बरस कि उम्र मे गरमि धुप के फ़ोडे हो जाते थे, मै आम चुस्ती और 
बदले में मुझे बदन प्र घंघोड़े गांव कि भाषा मे कह्ते थे , वो निकलतें, मै रातोँ मे रिर्याति , सो नहीँ पति थी 
सो नहीं पाती थी , बुआ जि मुझे कांधों प्र मेर सिर रखे गोद मे घूमती, वे भि नहीँ सोतई थि,
और जब मेरी शादी हो गई तो, उन्हे तब बेहद दुख हुआ जब मेर अस्तव्यस्त जिवन मे अंधी तूफां आये 
मेरे दुख उन्हे दुखी करते थे, हमेशा मेरे लिये वे कितने जतन करतीं थी एक बर वे बेतूल मुझे देखने मेरे भाई भाभी को लेकर आयी थी, मै पहली बर मा के गॉँव से इतनि दुर थि, वे बहुत याद कृति थि, म्न नहीँ मान तो, देख्ने आ गए थि 
उनकी आँखों कि ख़ुशी व तृप्ति मुझे याद है, जब बालाघाट मे मै स्कल स्कुल से लौटीं तो, बुआ  गांव से आये देखतीं तो, मै खुशि से कहति , बउआ जि, और उनकि आँखेँ मुझे देख भींग जाति थी, बउआ जि कि आंखो मे जो खुशि के आंसू झलकते थे, वो आज भि मुझे ज्यदा याद एते है,
समझमे आता है, कि औलाद के लिये मा हो य बउआ, उनकी कलेजी मे कैसि हुक सि उठतीं है बउआ जि तुम जंह भि हो,मै तुमहरि मंता कि कर्जदार हु.... 

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