ये जो धीमी सिंदूरी साँझ उत्तरि है, ये जो प्रणयी जोड़ें आपस मे करीब सीमत आये है
मुझे गांव कि वो शाम याद आ रही है , जब हम गांव मे होते थे
गांव, सुदूर पूर्व क मेर गॉँव , पिपल कि छॉंव , महँ कि मदमाती महक, आउर
और लहकते पॉंव, उमगते भव....esa सुहाना अपना स मेर गांव। … वंहा कि यादें ओह.... मई बाबूजी के गांव मे लौटी थी , बउआ जि के गॉँव से, आपने ग्यारहवें वर्ष मे , बुआ के इन्हा दर्ज , दर दार ग्यी थि, means fear
लौटके रोइ थि, बउआ जि को यादकर रोति थि, उन्हे बहुत मिस करतीं थि, उधर बउआ जि मुझे याद क्र रोति थि , कोइ नहीँ थ, जो इस हालत को सम्भल्तंएर मेर मेरा गॉँव अब बाबजी क गॉंव थ, जन्हाँ मै आपने घरकी सॅमने कि पार प्र षाम को आकेली बैठतीं, तो मेरे दोनो छ्होटे भाई मुझ्से कहनी सुनने कह्ते , मै रोज उन्हे आपने माँस मनसे हि कहनी कहानि सुनतीं थि,....
वो, दिन वो शाम धीमे से खिसके, रोना क्म हुअ, फ़िर आठवण मे ही थावे आठवी मे हि रेडिओ सुनतीं, व नोवल भि पड़ती, पहली घर के रमायण व सुशीला जैसि आदर्श किताबेँ, …बद्मे जब आगे कि कलास मे पहुंचि तो, गुलशन नन्द , रत्नू व प्रेम बाजपई के नोवल पडने लग़ी थि, इन्हीँ से साहीत्य से साबका हुअ।
मुझे गांव कि वो शाम याद आ रही है , जब हम गांव मे होते थे
गांव, सुदूर पूर्व क मेर गॉँव , पिपल कि छॉंव , महँ कि मदमाती महक, आउर
और लहकते पॉंव, उमगते भव....esa सुहाना अपना स मेर गांव। … वंहा कि यादें ओह.... मई बाबूजी के गांव मे लौटी थी , बउआ जि के गॉँव से, आपने ग्यारहवें वर्ष मे , बुआ के इन्हा दर्ज , दर दार ग्यी थि, means fear
लौटके रोइ थि, बउआ जि को यादकर रोति थि, उन्हे बहुत मिस करतीं थि, उधर बउआ जि मुझे याद क्र रोति थि , कोइ नहीँ थ, जो इस हालत को सम्भल्तंएर मेर मेरा गॉँव अब बाबजी क गॉंव थ, जन्हाँ मै आपने घरकी सॅमने कि पार प्र षाम को आकेली बैठतीं, तो मेरे दोनो छ्होटे भाई मुझ्से कहनी सुनने कह्ते , मै रोज उन्हे आपने माँस मनसे हि कहनी कहानि सुनतीं थि,....
वो, दिन वो शाम धीमे से खिसके, रोना क्म हुअ, फ़िर आठवण मे ही थावे आठवी मे हि रेडिओ सुनतीं, व नोवल भि पड़ती, पहली घर के रमायण व सुशीला जैसि आदर्श किताबेँ, …बद्मे जब आगे कि कलास मे पहुंचि तो, गुलशन नन्द , रत्नू व प्रेम बाजपई के नोवल पडने लग़ी थि, इन्हीँ से साहीत्य से साबका हुअ।
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