मेरे बुआ जी के गांव को कोना कोना स्मृतियों में बसा है हम हट्टा गांव के बड़े बाड़े में जाते थे, वो एक रियासत का कई बाड़ों का अहाता था, वंहा बाहरी अहाते, योन कहे गलियारे में थी, बावड़ी , वंही पास में था मंदिर, स्वेत मंदिर, और उसके कंगूरे, जन्हा प्रांगण में हम खेलते थे , सभी सहेलियां दौड़कर चियाचे छियाछै खेलते थे, वंही पेड़ थे, जिनसे जो सूखे फल गिरते, उनसे हम वंही फर्श पर बैठकर भौंरे खेलते, कितना मस्त लगता था, जब लौटते तो, मंदिर हमारे मानस में खुशियां बिखरता, हमारे चेहरों पर उल्लाश व् परितृप्ति फ़ैल जाती थी , आज भी मेरी स्मृति में वो मंदिर दमकता रहता है, अपने यशश्वी गौरव के साथ। ।
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