Sunday, 27 December 2015

Saawan Bhadon (1970) - Kaan Mein Jhumka Chaal Mein Thumka - Mohd.Rafi

aangan: आज माँ को मैंने बताई माँ मई ५४ क हो गयी माँ  ने न...

aangan: आज माँ को मैंने बताई माँ मई ५४ क हो गयी 
माँ  ने न...
: आज माँ को मैंने बताई माँ मई ५४ क हो गयी  माँ  ने नही पता क्या महसूस किया होगा  वो, तो , अपनी तकलीफ से परेशान रहती है, उसे बहुत ठण्ड लगती ...
आज माँ को मैंने बताई माँ मई ५४ क हो गयी 
माँ  ने नही पता क्या महसूस किया होगा 
वो, तो , अपनी तकलीफ से परेशान रहती है, उसे बहुत ठण्ड लगती है 
मुझे माँ से कहते हुए बुआजी की याद आ गयी, और आवाज रुंध गयी 
एक पल लगा बुआ जी तुम एक पल को मील जाती तो पर 
हम चाहे जो कर ले अपनों से बिछड़ों को नही पा सकते 
जो, चले गए है, हम उन्हें लौटा नही सकते 
इश्लीए जिनके साथ आज है , उनकी परवाह करे 
क्या पता वक़्त के इस तेज़ बहाव में वो, दूर चले गए , हमसे बिछा गए तो, हम उन्हें नही धुंध ढूंढ सकेंगे 
बुआ जी तुम एक पल को आ जाती तो, 
वंही हटा हट्टा का घर होता तो, बुआ जी, हम सब कितनी ख़ुशी से रहते 
मम्मी वंही छोटी सी जागेश्वरी आपके कन्धों पर लदी बिसूरती होती थी 
बुआ जी, और धीरोजा के जाने के बाद मेरे नखरे उठाने वाले अब नही है फिरभी 
जो, मेरे साथ है, मई उन सबका तहेदिल से सम्मान करती हूँ , और सबको बहुत चाहती हूँ 
क्यूंकि, हमारे अपने स्वजन हममे ईश्वर ने प्रदान किये है , हमे प्रभु के उपहारों के लिए उसका शुक्रिया हमेशा दिल से करना चाहिए , आओ, हम उस रा का धन्यवाद के, उसने हमे जो साथी दिए है, उन सको चाहे 
क्यूंकि, एक नियत समय के लिए ही हम साथ है, वरना काल के परवाह में जाने कान्हा जायेंगे 
फिर भी प्रभु से प्रार्थना करते है, की हम सभी साथ रहे , कही हमारे अपने हमसे अलग न हो 

Tuesday, 22 December 2015

vnha mhua jhrta tha: vnha mhua jhrta tha

vnha mhua jhrta tha: vnha mhua jhrta tha: घर के पीछे अमराई के छोर पर था ,एक महुए का पेड़, जो जाड़ों में लदब्दा के फलता था, और उससे बहुत से महुए गिरते थे.तब भोर के पहले मुंह अँधेरे एक...

Mero Khoy Gayo Baajuband Rasiya [Full Song] Kanhaiya Hori Khelne Aaya

Friday, 18 December 2015

खेल मेरे थे जो प्यारे 
जिंदगी के थे , जो सहारे 
छूटे जन्हा थे किनारे 
अब हम किसको पुकारे 
हुए बेसहारे 
प्रभु तुम ही तारे 
धरती से पहुंचे 
तो, बनके तारे 
वंही रहेंगे तुम जब हम देखा करेंगे 
माघ की ठिठुरती रातों में 
वे साथ जाने कहा गए 
दीदी का फ़ोन आया की 
भोला , मेरा छोटा ममेरा भाई नही रहा 
उसकी बाईपास सर्जरी हुई थी बहुत रोता था बहुत 
तकलीफ होती थिचाले गया हमारे मां जी भी ऐसे ही अचानक चले गए थे 
कहा. चले जाते है, हाड़मांस के पिजर 
ये सब, उड़के किश देश चले जाते है नही पता ढूंढा करेंगे आसमान के तारों में 
जादू की निर्जन रातों में 

Tuesday, 10 November 2015

 बुआजी के घर की दिवाली क्या खास होती थी वो, ख़ुशी 
आज कहा , फिर भी हमारे साथ बच्चेहो 
इन्ही हमारी ख़ुशी है वो, वक़्त 
आज भी यादों में 
मीठे की तरह घुलता जाता है 

Friday, 6 November 2015

जब भी गांव में फोन पर भाई से बातें करती हूँ माँ हमेशा कहती है 
जागेश्वरी है क्या 
माँ को बहुत तकलीफ है 
कहती है, उठा नही जाता 
बहुत मुस्किल से उठती है 
भीतर कंही सलता है दर्द 
मई माँ का कोई इलाज नही बता सकती बस 
उसकी बातें सुनकर खामोश हो जाती हूँ 
किसी का दोष नहीं है 
सब वक़्त की बात है 
कभी माँ हम ७ बच्चों के लिए तीज-त्यौहार में पकवान बनाती थी 
सबके बिस्तर की चादरें धुलवाती थी आज 
वो , बिस्तर पर फ़टे कपड़ों में सिमटी रहती है 
माँ तुम इतनी उदाश और बेबस कैसे हो गयी हम सब बहन-भाइयों का 
विवाह कर हमारा घर बसने वाली तुम आज इतनी दुःख में क्यों लथड़ी हो ,
माँ। 

Thursday, 5 November 2015

मैंने ऐसी उदासी मौसम में आज महसूस की है 
दिशाएं सूनी लगती है 
पक्षी न जाने कंहा चले गए है 
वाकई, ये एक बेरहम सूखा है 
जो, १९७० के बाद का सबसे भीषण है 

Sunday, 1 November 2015

आँगन की ३०९ पोस्ट की ८७०० pageviews है 
जबकि , बनारस की बयार की १३३० पोस्ट की ७६५४ pageviews है 
ये वाकई आश्चर्यजनक है 
जिस बनारस की बयार को मैंने ज्यादा लिखी 
वो, मेरे आँगन ब्लॉग से पीछे है 
इससे पता चलता है , कि 
जिवंत प्रसंग ज्यादा पढ़े गए 
बधाई , आँगन ब्लॉग को 

Wednesday, 21 October 2015

माँ इसलिए होती है 
कि बलाएँ उतार लेती है 
माँ 
जाती है , मंदिरों में मजारों में 
मन्नत मांगती है 
बेटे के लिए दुआ करती है 
उसके विवाह के लिए 
सबसे चिरौरी करती है 
मैं माएं इसलिए तो होती है 
यदि माँ न हो तो 
कौन करेगा ये सब 

Monday, 7 September 2015

 कल, रात मामा जी नही रहे 
मुझे बचपन के  याद आये , जब हम सभी मामा-गांव जाते थे, गर्मियों में 
वंहा मां जी भी अपने परिवार सहित आते थे, बहुत अच्छे थे वे, बाहर वे सर्विस करते थे 
 शांत स्वाभाव के, और मुस्कराकर बातें करते थे 
मेरा  था,
बुआ  घर से माँ के घर  जाती थी, ज्यादातर पेंट शर्ट पहनती और ,मेरे घुंगराले बाल , मेरे माथे पर ऐसे बिखरते की, आँखे आँखे तक ढक जाती थी, अपनी बिखरी घुंगराली लटों से झांकती मेरी तेज बड़ी बड़ी  आँखें,दीदी बताती   चिल्लाती थी ,  से बालों को  नही ,
सारे वक़्त हाथों  धनुष-बाण लेकर खेलना, यूँ  ,रामलीला की नकल करना , और राधेश्याम के दोहे बोलना, ये  थे , मेरे शौक 
माँ रोटी  सिखाती थी , वो, पहले बोलती, एक लाइन लाइन मई दूसरी लाइन बोलती थी 
माँ कहती , -शुद्धि करो, …। मई कहती ---शुद्ध काम 
माँ कहती ---  भक्ति करो , मई ----भगवत मिले 
माँ---युक्ति करो  , मई कहती  ---आदर  मिले मिले 
माँ कहती -----भगति के ----, मई जोरो  से चिल्लाकर  कहती ----भक्ति  जगधाम 
वाकई वे    

Friday, 28 August 2015

Wednesday, 19 August 2015

माँ फोन पर bol, बोल नही पा रही 
जो, वे बोलती है कुछ नही समझ में आता 
और, 
फिर उसके लिए प्रेयर की 
उसे अस्पताल ले गए,
अब, वो ठीक है 

Friday, 31 July 2015

माँ से कल बातें हुई 
वो, आवाज भी अब ठीक नही आती 
वो, कह रही थी की आचार खाना है 
कल, उसके लिए वंही भेज रही 
माँ , तुम हमारे लिए 
क्या क्या बनाती थी 
पर्वों में बहुत याद आती है 
माँ , तुम्हे याद करते ,
आज भोर में उठते ही 
छत पर गयी थी 

Saturday, 23 May 2015

माँ  
माँ 
तुम 
घर का एक 
जिन्दा कोना हो 
कल, जब तुमने 
मुझे फोन कर कहा की इतनी 
इतनी गर्मी में 
तुम १५ दिन से नही नही ,नहायी हो क्यूंकि 
तुम व्हील चेयर पर हो 
और तुम्हे 
कोई नहाने पानी नही देता 
क्यूंकि 
तुम्हारे कपड़े 
निचोड़ने से वो 
बचते है 
माँ,
मुझे उस माँ की याद  आ रही है 
जिसे उसके बेटे बहु ने 
निकल दिए थे 
और वो, 
अपनी फूस की झोपडी में 
मृत पाई गयी थी 
क्योंकि 
जलकर मर गयी थी 
माँ 
तुम माँ क्यों हो 
क्यों तुमसे 
तुम्हारे बच्चों को 
इतनी विरक्ति है 
जबकि 
आज भी 
हमे देखकर 
तुम्हारी आँखों में 
वैसी ही चमक आ जाती है जैसे बचपन में 
आती थी 

Sunday, 17 May 2015

आज अचानक गांव चली गयी 
बचपन का गांव 
जैसे पीपल की छाँव 
कुछ पुराने पथराए चेहरों पर 
फूटी एक हंसी की किरण 
भींग गया मन 
जैसे हो, झरने की फुहार 
ऐसा था 
रसभीना 
मेरे अपनों का प्यार 
कुछ पल को सब, नतमस्तक थे 
जैसे मई अपने पुराने 
ऐश्वर्या को पा रही थी 
किन्तु वो विगत था 
आज मेरे पास संघर्ष है 
आगत के लिए 
लगी रहहति हूँ 
जी जान से 
फिर भी 
पाकर उस पुराने स्नेह मान को 
मन, भर गया था 
ओजस्वी अभिमान से 

Sunday, 10 May 2015

Ab Ke Sawan Mein Jee Dare - Jaise Ko Taisa

मृदुला मैडम जी 
                   नमस्ते 
                  आपसे रोज ही बातें होती है 
                         किन्तु, फोन पर आपकी बात 
                         काटकर, या आपको बीच में 
                        रोककर नही कह पाती 
                            कि , आप प्लीज् मेरी स्क्रिप्ट 
                                   रजिस्टर्ड पार्सल से 
                                लौटा दीजिये 
                                      मई आपको अपना पता दूंगी 
                                               कृतज्ञ 
जोगेश्वरी ,                                       (विनम्र निवेदन )
मेरा पता है 
                जोगेश्वरी सधीर , लेखिका 
                  c/o नामदेव्  साहू , अधिवक्ता 
                       वार्ड नम्बर ३३ 
                            हरिओम नगर 
                            बालाघाट , मप्र  ४८१००१ 
                               आप डाक से ही भेजिए ,
                                     यंहा कुरियर नही पहुंचेगा 
या मुझे डिटेल लिखना होगा 

aangan: माँ तुम हो नम आँखों का धुंवा यादों का है कोई  भ...

aangan: माँ 
तुम हो नम आँखों का धुंवा 
यादों का है 
कोई  भ...
: माँ  तुम हो नम आँखों का धुंवा  यादों का है  कोई  भरा हुआ कुंवा  जिसे नही झांकता है कोई  पर माँ  तुम वो, हो  जो, उन आवाजों को  महसूस...
माँ 
तुम हो नम आँखों का धुंवा 
यादों का है 
कोई  भरा हुआ कुंवा 
जिसे नही झांकता है कोई 
पर माँ 
तुम वो, हो 
जो, उन आवाजों को 
महसूस करती हो 
आज तक 
उदाश आँखों में 
सामने तपती दोपहरी में 
आँगन का उदास कोना 
जैसे कंही सुस्त रहा हो 
सिपहिया पक्षी 
माँ 
तुम नही बनाती हो 
आचार पर 
महसूस करती हो 
उसे कहते हुए 
मेरे चटखारे लेते ओठों को 
माँ 
तुम रोज बुलाती हो , मुझे 
और भोर से उठकर 
तकती हो राह 
माँ 
अलगनी पर 
यूँ ही सूखते 
तुम्हारे उतारे हुए 
बिना धोये कपडे 
हफ्तों हमारी उपेक्षा पर 
हिकारत से पड़े रहते है 
माँ 
क्यों तुम 
हमारे लिए 
दुनिया की 
सबसे बेकार 
गयी गुजरी वास्तु हो 

Thursday, 7 May 2015

 कुछ लोगों के लिए 
माँ 
उसकी मृत्यु के पूर्व ही 
मर जाती है 
नही पता क्यों 
वो,
माँ के अंत्येष्टि की बारात 
वक़्त के पहले 
सजा लेते है 
दुनिया के सामने 
बजे-गाजे से 
जाती माँ की 
अर्थी का अर्थ 
उनकी निवृति हो जाता है 
इनमे हम सभी शामिल है 
माँ 
हमारे लिए 
वक़्त से पहले 
जीवन से 
अदृश्य हो जाती है 
दुनिया के 
और अपनों के 
सितम सहके आती हूँ यंहा पर 
यदि, यंहा भी 
वंही सब कुछ मिले तो मई कहा जाऊ 

Tuesday, 5 May 2015

माँ 
तुम्हारी 
डबडबाई आँखों में 
काश कोई 
देख पता कि 
उसमे अपने बचपन की 
कितनी, यादें छिपी है 

Monday, 4 May 2015

माँ माँ 
सबने आपको भुला दिया 
की, अपने हमे जन्म दिया था और 
हमे पला पोसा था 

Sunday, 3 May 2015

aangan: To ask from you,Kaun ho tum So, it will not be a...

aangan: To ask from you,
Kaun ho tum 
So, it will not be a...
: To ask from you, Kaun ho tum  So, it will not be a question Tedha  You can be a restless soul  Cycle in which the fingers Bissau  Padm...

aangan: आँगनआँगन का मतलब है माँ जो, कभी ये अहसान नही ब...

aangan: आँगन
आँगन का मतलब है 
माँ 
जो, कभी ये 
अहसान नही ब...
: आँगन आँगन का मतलब है  माँ  जो, कभी ये  अहसान नही बताती  की, मैंने तुम्हे जन्म दिया है  तो, तुम मेरे लिए  कुछ करो मेरा आँगन  मेरे ब...
आँगन 
आँगन
आँगन का मतलब है 
माँ 
जो, कभी ये 
अहसान नही बताती 
की,
मैंने तुम्हे जन्म दिया है 
तो, तुम मेरे लिए 
कुछ करो मेरा आँगन 
मेरे बिछड़े आँगन 
तुम मेरे 
माता पिता का स्नेह हो और उनकी धरोहर हो 
धीरे धीरे 
माँ का हाशिये पर 
खिसक जाना 
और फिर 
बच्चों के 
जीवन के 
परिदृश्य से 
गायब हो जाना 
oh, aaj ka 89 viewsमेरे लिए अचम्भा है 
आँगन 
आपका जवाब नही २ मई को 
८० पगेवििेवा pageviews

Wednesday, 29 April 2015

आँगन के पेज व्यू से भी मई हैरान हूँ 
एक दिन में ७८ पेज व्यू है 

Haath aaya hai jabse tera haath mein

Monday, 27 April 2015

आँगन आँगन 
तुम्हे सब चाहते है इसकी वजह 
मुझे भी बताओ 
मई भी तुम्हे चाहूंगी 
मेरे
मेरे प्यारे आँगन 
नही पता क्यों 
तुम इतने ज्यादा पढ़े जाते हो जबकि,
मई तुम्हे नही लिखती ज्यादा न, ही तुम्हारा 
प्रचार ही करती हूँ तुम, फिर भी 
बनारस की बयार से 
आगे चलते हो क्या कहु 
तुम्हारी इस पससंद 
पसंद व् प्रोग्रेस पर 

Monday, 23 March 2015

कल
कल, 
शाम से 
सो गयी थी बिना दिए लगाये 
रात ऐसा लगा 
नींद में 
जैसे मई 
अपने बचपन में 
बुआ जी के घर में हूँ 
एक पल का 
वो, अहसास 
मुझे सुकून दे गया 

Tuesday, 3 March 2015

माँ
माँ कितने भजन जानती व् गाती है 
अद्भुत है, उसका ज्ञान,
कबीर के वो भजन तो, आज के शोध-छात्र भी नही जानते जो माँ 
गाती है माने 
माँ ने कल, अचानक गाना शुरू किया 
मन मस्त हुआ फिर क्या बोले 
माँ से मैंने पुछि 
माँ , वो मराठी की कविता सुना न 
जो, कोयल पर है 
माँ ने कुछ गए कर कही मैंने  ऐसे लिखी 
श्लोक --येथे , समस्त बहरे बसतात , का भासने कोकिल वर्ण बहूनि  .......... 
माँ ने इस श्लोक का अर्थ भी बताई, जो मैंने लिखी 
हे कोकिला , तू इतनी मीठी आवाज में क्यों गाती है , यंहा तो ,
सभी बहरे बसते है , तो, तेरे काले रंग पर हँसते है , वो , तेरी 
मीठी आवाज को क्या जानेंगे ,. ये कोकिला इतनी मधुर आवाज कहूँ काढ़ते ,
ये तुला काला रंग पाहून कौआ मानते 
मेरी अल्प-शिक्षित  संस्कृत-हिंदी व् मराठी में जो भावार्थ कहकर सुनाया, तब मई 
चकित रह गयी, की माँ कितनी तेज है , काव्य कहने व् गीत गाने में। … 
माँ ने बताई , उसके पिता अर्थात मेरे नाना घर में हमेशा जब भी पंगत करते, पंगत 
बैठने पर माँ को बुलाते, जो, ७ या ८ बरस की थी, और वो, ये श्लोक भावार्थ सहित कहती थी ये 
ये मराठी की बहुत ही प्यारी कविता भी है 

Tuesday, 27 January 2015

Haath aaya hai jabse tera haath mein

नही
नही पता 
ये जिंदगी 
बैनगंगा से 
गंगा जी तक 
कैसे चली गयी 
कितने लोग मिलते रहे 
बिछुरते रहे 
और मई सभी को सपनों की तरह 
संजोती रही 
ये भी नही समझा 
की, सब क्यों मिल जाते है बस 
इतना जानती हूँ 
कि मई कुछ खास हूँ 
जन्हा सभी मुझे मिलते है 
और अनायास मुझे सबका स्नेह भी मिलता है 

Saturday, 24 January 2015

सभी
सभी आँगन को पसंद करते है 
कोई भी जैसे बनारस की बयार को नही चाहता 
किन्तु मुझे बहुत पसंद है बनारस की बयार लिखना 

Thursday, 15 January 2015

Mahendra & Asha Tumhara Chahne Wala - Kahin Din Kahin Raat 1968]

Makhna - Bade Miyan Chote Miyan 1998

आज गांव  गयी थी 
माँ ने मुझे देखकर , भजन गाने शुरू  दिए 
पर, मई बैठ भी नही सकी 
 भतीजियों ने मुझे बछड़ा दिखने ले गयी 
और मैंने , उसके फोटो लिए 
बीएस, इतना सा रहा 
गांव का सफर 

Saturday, 10 January 2015

aaj kal yaad kuch aur rehta nahin

आँगन को
आँगन को 
पाठकों का इतना प्यार मिला है 
की इसने , बनारस की बयार को पीछे छोड़ दिया है 
वो, महिला जो,
सड़कों पर घूमती हुयी 
भीख मांगती है 
अपने बूढ़े हाथों में झोली टांगे 
शहर के मोहल्ले भटकती है 
उसे हे राम कहते सुना है 
और वो , मंदिर के बाहर भी बैठी थी 
कि उसका कोई घर नही है 
वो , ऐसे ही पीले रंग की साड़ी पहने होती है 
जाने किस गांव से लौटी है 
इस शहर में अपने वजूद को बचाने 
जन्हा, उसका अपना कोई नहीं है 
यदि है, तो बीएस ,
उसके जैसे दूसरे भीख मांगने वाले 
जिनके पास कोई वोटर कार्ड नही है 
इश्लीए, वो, भूखे नंगे अपना वजूद बचाने घूम रहे है उधजर वो, है 
उधर वो, है 
जो, सरकार से अरबों का कर्ज लेकर भी 
सरकारों से माफ़ी की भीख मांग रहे है 
कितनी, असमानता है 
हमारे सभ्य देशों में