Monday, 12 May 2014

वो दिन 
जब बुआ जि के घर से 
बाबूजी के घर तक कि यात्रा 
बैलगाड़ी से होती थी 
सुबह अलसुबह उठकर 
मुंह हाथ धोकर 
उस बैलगाड़ी मे बुआ के सांग बैठना 
जिसे घर क नौकर 
इतनी ही सुबह आकर फांदता 
हम तीनों चुपचाप सुबह के मुनह अँधेरे 
चले जाते चुपचाप दुर तक 
रास्ता भी खोमोशी से गुजरता थ था 
फिर एक एस एसा ऐसा 
सरोवर आता 
जन्हा उगते सूर्य कि किरणें झलकती 
रश्मियाँ लहरों मे किल्लोल करतीं 
वंहा सारस के जोडे नज़्र आते थे 
वो, गर्मी के अन्त के दिन होते 
वर्ष वर्षा के आगमन क आग़ाज  होता थ था 
आकाश में छाने वाले मेघों को देखकर। …। 

1 comment:

  1. ye mere blog h, mujhse ijjajat lekr aap inhe chhap sakte h

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