Tuesday, 27 May 2014

कल मई साँझ में सोकर उठी , दिन डूबता ही थकी सो गयी थी, नींद टूटी , तो दिन डूब रहा था, कमरे में हल्का अँधेरा, पर सूरज का उजाला धुंधला होता हुआ , मई सोचने लगी की, ये गर्मी की जाती हुई शाम है, मौसम का संधिकाल है , गुजरते मौसम का , और दिन ढलने का वक़्त, अजीब सी रिक्तता भर गयी , फिर जाने कैसे एकदम से बुआ जी याद आई , लगा बुआ जी अपने घर में गुजरते गर्मी के मौसम में छाप[ऋ में बैठी है , दलन में वो, सामने कोई तरबूज कटा हुआ लेकर बैठी , मेरे आने की राह देख रही है , इन्ही उनकी, मुद्रा जब वो, सहज बैठी होती, कंधे पर आँचल होता, सर के स्वेत केश बिखरे से होते, वे मुश्किल से ही कंघी करती थी, पीटीआई व् बेटे के जाने के बाद उन्होंने कुछ उम्र के बीतने पर साज श्रृंगार छोड़ दिया था, ढलती उम्र, उदाशि पर, चेहरे पर वंही गौरव व् तेज , शायद सम्पन्नता की वजह से, क्योंकि जीवन का दुःख पर, जीविका की चिंता नही बुआ जी की याद से मन बहुत ही टिकट हो गया। वो, बहुत ही विकट वक़्त था , किन्तु बिट ग्य… मई फिरसे नई जगह जाउंगी, जीवन कहा कहा ले जाता है, किन्तु , मन वंही रह जाता है , जन्हा से बचपन बिता था, तभी तो कल बुआजी थाली में तरबूज लिए याद आ गयी , मुझे वे अपने हाथों से खिलाती थी। ।आज्त्क उनके हाथ से बनाई व् खिलाई रोटी , ययद आती है, बहुत मीठी स्मृति। ……। 

1 comment:

  1. ynha bahut shor ke bich disterbanse me likhti hu, cafe me

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