aangan:
<!--more-->ek mntri
एक मंत्री के यंहा बंगले में ...
Friday, 14 October 2016
Thursday, 21 April 2016
aangan: यंहा लोग उतने दयालु नहीं है जो गौओं को पलटे है प...
aangan: यंहा लोग उतने दयालु नहीं है जो
गौओं को पलटे है
प...: यंहा लोग उतने दयालु नहीं है जो गौओं को पलटे है पालते है वे गवधि गोठी गावठी लोग दया का भाव नहीं रखते आज मैंने एक ऐसे निर्मम आदमी को ...
गौओं को पलटे है
प...: यंहा लोग उतने दयालु नहीं है जो गौओं को पलटे है पालते है वे गवधि गोठी गावठी लोग दया का भाव नहीं रखते आज मैंने एक ऐसे निर्मम आदमी को ...
यंहा लोग उतने दयालु नहीं है जो
गौओं को पलटे है
पालते है
वे गवधि गोठी गावठी लोग दया का भाव नहीं रखते
आज मैंने एक ऐसे निर्मम आदमी को गाय व् बछिया को ले जाते देखि
जो, गौ माँ पपर बड़ी गलत तरीके से लकड़ी मार रहा था वो, पीछे से
गौ माँ के प्रजनन अंग पर लगातार लकड़ी कोंच रहा था
ये लोग किसान व् पशुपालक होते है ये
बहुत निर्मम हो जाते है िंममे गाओं को पलने के बदले
उन्हें इस्तेमाल करने की भावना होती है
ये बहुत दरिंदे होते है
कई लोग गौओं की पुंछ काट देते है गौओं के अलावा
ये सभी बैलों से भी बहुत निर्ममता से पेश आते है
इन्हे ललकारने व् रोकने की जरुरत है देश के ज्यादा किशन व् पशुपालक
अपने दकियानूसी होते है
इन्हे रोका जाये तब भी नहीं सुनते इन्हे
कानून से रोक सकते है
पर कानून का राज कंहा बचा है
लोग अपनी स्वैर्त-लिप्सा को ही
जिंदगी का ध्येय मान रहे है
गौओं को पलटे है
पालते है
वे गवधि गोठी गावठी लोग दया का भाव नहीं रखते
आज मैंने एक ऐसे निर्मम आदमी को गाय व् बछिया को ले जाते देखि
जो, गौ माँ पपर बड़ी गलत तरीके से लकड़ी मार रहा था वो, पीछे से
गौ माँ के प्रजनन अंग पर लगातार लकड़ी कोंच रहा था
ये लोग किसान व् पशुपालक होते है ये
बहुत निर्मम हो जाते है िंममे गाओं को पलने के बदले
उन्हें इस्तेमाल करने की भावना होती है
ये बहुत दरिंदे होते है
कई लोग गौओं की पुंछ काट देते है गौओं के अलावा
ये सभी बैलों से भी बहुत निर्ममता से पेश आते है
इन्हे ललकारने व् रोकने की जरुरत है देश के ज्यादा किशन व् पशुपालक
अपने दकियानूसी होते है
इन्हे रोका जाये तब भी नहीं सुनते इन्हे
कानून से रोक सकते है
पर कानून का राज कंहा बचा है
लोग अपनी स्वैर्त-लिप्सा को ही
जिंदगी का ध्येय मान रहे है
Friday, 15 April 2016
Tuesday, 5 April 2016
Thursday, 17 March 2016
Monday, 14 March 2016
Thursday, 10 March 2016
माँ जो एक कपडे में लिपटी
घबराहट से मल-मूत्र का वेग नही रुकता
और, हम सब पहुंचे
तो, मेरी छोटी बहन को देखकर रोने लगी
दोनों रो रही थी
माँ बोल रही थी, रोते हुए
क्या गति हो गयी बाई , मेरी
माँ कैसे सहन करती है
मेरी बड़ी बुआ के अंतिम दिनों में
वो, पलंग पर रहती थी पांव टूट गया था
सब कुछ बहुत मुश्किल हो गया था
बाथरूम-टॉयलेट की परेशानी बहु-बेटियों ने ही सब किया
गाँवों में आया या नर्स नही मिलती
अंतिम सफर के पहले सभी सफर करते है
माँ तुम अंतिम यात्रा पर निकलो
इन्ही सब चाहते है क्यूंकि
कोई तुम्हारी मदद नही कर पता
तुम भी कितनी सुख सी गयी हो हाथ जैसे
लकड़ी के हो, नाड़ियाँ दिखती है
माँ
घबराहट से मल-मूत्र का वेग नही रुकता
और, हम सब पहुंचे
तो, मेरी छोटी बहन को देखकर रोने लगी
दोनों रो रही थी
माँ बोल रही थी, रोते हुए
क्या गति हो गयी बाई , मेरी
माँ कैसे सहन करती है
मेरी बड़ी बुआ के अंतिम दिनों में
वो, पलंग पर रहती थी पांव टूट गया था
सब कुछ बहुत मुश्किल हो गया था
बाथरूम-टॉयलेट की परेशानी बहु-बेटियों ने ही सब किया
गाँवों में आया या नर्स नही मिलती
अंतिम सफर के पहले सभी सफर करते है
माँ तुम अंतिम यात्रा पर निकलो
इन्ही सब चाहते है क्यूंकि
कोई तुम्हारी मदद नही कर पता
तुम भी कितनी सुख सी गयी हो हाथ जैसे
लकड़ी के हो, नाड़ियाँ दिखती है
माँ
Tuesday, 8 March 2016
aangan: वे लोग खुलकर खेल रहे है खुले आमदेश के साथ खिलवाड़ ...
aangan: वे लोग खुलकर खेल रहे है खुले आम
देश के साथ खिलवाड़ ...: वे लोग खुलकर खेल रहे है खुले आम देश के साथ खिलवाड़ कर रहे है वे देशभक्तो संग मसखरी कर रहे है देश के जवानों पर घिनौने बयान दे रहे है वे अ...
देश के साथ खिलवाड़ ...: वे लोग खुलकर खेल रहे है खुले आम देश के साथ खिलवाड़ कर रहे है वे देशभक्तो संग मसखरी कर रहे है देश के जवानों पर घिनौने बयान दे रहे है वे अ...
वे लोग खुलकर खेल रहे है खुले आम
देश के साथ खिलवाड़ कर रहे है वे
देशभक्तो संग मसखरी कर रहे है
देश के जवानों पर घिनौने बयान दे रहे है
वे अपनी लोकप्रियता के लिए
और संघ को चिड़ाने
जो मन में आता है
बक देते है देश के बड़े विपक्षी नेताओं की उन्हें
सह मिली हुई है
कश्मीर पर भारत का नाजायज हक़ बताने वाले
देश के कैसे नागरिक है वे
पाक एजेंसी के हाथों खेल रहे है
इन्हे कान्हा से फण्ड मिला है
इसकी जाँच होनी ही चाहिए
देश के साथ खिलवाड़ कर रहे है वे
देशभक्तो संग मसखरी कर रहे है
देश के जवानों पर घिनौने बयान दे रहे है
वे अपनी लोकप्रियता के लिए
और संघ को चिड़ाने
जो मन में आता है
बक देते है देश के बड़े विपक्षी नेताओं की उन्हें
सह मिली हुई है
कश्मीर पर भारत का नाजायज हक़ बताने वाले
देश के कैसे नागरिक है वे
पाक एजेंसी के हाथों खेल रहे है
इन्हे कान्हा से फण्ड मिला है
इसकी जाँच होनी ही चाहिए
Monday, 7 March 2016
aangan: माँ पल पल छीन छीन मृत्यु की प्रतीक्षा में क्यूंक...
aangan: माँ पल पल छीन छीन
मृत्यु की प्रतीक्षा में
क्यूंक...: माँ पल पल छीन छीन मृत्यु की प्रतीक्षा में क्यूंकि अब पांव नही उठते कमर के निचे का हिस्सा उठता नही सभी को बहुत परेशानी पर मृत्यु क...
मृत्यु की प्रतीक्षा में
क्यूंक...: माँ पल पल छीन छीन मृत्यु की प्रतीक्षा में क्यूंकि अब पांव नही उठते कमर के निचे का हिस्सा उठता नही सभी को बहुत परेशानी पर मृत्यु क...
माँ पल पल छीन छीन
मृत्यु की प्रतीक्षा में
क्यूंकि अब पांव नही उठते
कमर के निचे का हिस्सा उठता नही
सभी को बहुत परेशानी
पर मृत्यु के देव
जबतक नही आते
आपको इस संसार में
सांसो का कर्ज
चुकाना होता है
माँ , तुमने कोई पाप नहीं किया
वो, महाकाल
जब उनकी सुधि हो
तब ले जाते है
तुम हो तो एक जोड़ी आँखें
हमें महत्वपूर्ण महसूस करती है
तुम चले जाओगी तो
वो , जगह हमेशा के लिए
खली हो जाएगी
मृत्यु की प्रतीक्षा में
क्यूंकि अब पांव नही उठते
कमर के निचे का हिस्सा उठता नही
सभी को बहुत परेशानी
पर मृत्यु के देव
जबतक नही आते
आपको इस संसार में
सांसो का कर्ज
चुकाना होता है
माँ , तुमने कोई पाप नहीं किया
वो, महाकाल
जब उनकी सुधि हो
तब ले जाते है
तुम हो तो एक जोड़ी आँखें
हमें महत्वपूर्ण महसूस करती है
तुम चले जाओगी तो
वो , जगह हमेशा के लिए
खली हो जाएगी
Friday, 4 March 2016
सब उसे हे राम के नाम से जानते है
वो, एक वृद्धा स्त्री भीख मांगती थी
मांगती है पहले एक युवा लड़की उसे सहारा देती थी किन्तु
अब वह वृद्धा अकेले मांगती है और
शहर से गुजरते वक़्त हे राम जरूर कहती है इसलिए
सब उसे हे राम के नाम से जानते है
ये सही है, की हमारे क्षेत्र के मंत्री की आय अब २००० करोड़ हो चुकी है पर
वह किसी की मदद नही करता
और जिन्हे सरकारी मदद देता है
उन्हें वह बहुत प्रचारित करता है यंहा की जो भी योजना होती है
उसमे से वो अपना हिस्सा लेता है सब जानते है, कि उसने इतना बड़ा साम्राज्य
कैसे भ्रस्टाचार से माया है उसकी जाती वाले
बहुत भ्रस्टाचार करते है
पर कोई पकड़ा नही जाता
वो, एक वृद्धा स्त्री भीख मांगती थी
मांगती है पहले एक युवा लड़की उसे सहारा देती थी किन्तु
अब वह वृद्धा अकेले मांगती है और
शहर से गुजरते वक़्त हे राम जरूर कहती है इसलिए
सब उसे हे राम के नाम से जानते है
ये सही है, की हमारे क्षेत्र के मंत्री की आय अब २००० करोड़ हो चुकी है पर
वह किसी की मदद नही करता
और जिन्हे सरकारी मदद देता है
उन्हें वह बहुत प्रचारित करता है यंहा की जो भी योजना होती है
उसमे से वो अपना हिस्सा लेता है सब जानते है, कि उसने इतना बड़ा साम्राज्य
कैसे भ्रस्टाचार से माया है उसकी जाती वाले
बहुत भ्रस्टाचार करते है
पर कोई पकड़ा नही जाता
Thursday, 3 March 2016
माँ की शक्ति चूक गयी है
वो अपने आप से कुछ भी नही कर पा रही है
उसमें ताकत नही रही
बहुत दिनों से रो रही थी
और, उसे शक्ति का भोजन न देकर इंजेक्शन लगा रहे थे
ये बहुत नुकसान दायक होता है
इससे कमजोरी आती है
मौत भी हो सकती है
उसे मैंने चने का सूप देने कही थी
पर वे लोग बिलुल नही सुनते थे अब माँ मौत के मुहाने पर है
वो असमय मौत के पास है यदि उसे एक कप दूध और चने का सूप देते तो, उसे तत्काल एनर्जी मिलती
पर वे उसे समझते थे
मेडिसिन भी इस अवस्था में बेकार साबित हो गयी
माँ बचाई जा सकती थी वे उसे बिलकुल नही सुनते थे
और कहते थे, की ये वो कहती है
जबकि, माँ को जो दिया जाये वंही वो खा सकती है
माँ की असामयिक कमजोरी और दुर्दशा के लिए वे लोग जिम्मेदार है
उन्होंने उसकी समस्या नही सुनी वे लोग उसे चिल्लाती छोड़कर
उसके कक्ष से गुजरते थे वो, रातदिन रोटी थी यदि
मई कोई सलाह नही सुनते थे और
कहते थे , कुछ हो गया तो, हम नही करेंगे
उन्होंने इसे साबित करके दिखाया
माँ उठ नही पाती थी,
कलपती रहती थी
पर वे नही सुनरही थे
माँ अपने छोटे बेटे से मोरल सुपोर्ट मांगती रही वो
छटपटाती थी, की बीटा उसे देखेगा
वे लोग नही सुन सके क्यूंकि
उन्होंने कह रखा था, की
कुछ हो गया तो हम नही करेंगे
जब माँ अपनी बीमारी व् कमजोरी में रातदिन रो रही थी
तब, छोटा भाई गांव चले गया
वंहा वक़्त गुजरता रहा
और बड़ा बीटा अपनी बीबी के साथ अपने बेटे के पास चले गया
माँ के तड़पने या रोने का कोई असर नही हुआ
वे लोग अपने करते कर्तव्य निभा चुके थे
वे पहले सेवा कर चुके थे
माँ का रोने , जीने मरने से असम्प्रक्त बेटे
अब दीदी वंहा जाकर माँ को उठा बैठा रही है
दीदी जो सबके दुःख में सहभागी होती है
उसके बच्चे नही है पर
हृदय में दया है
वो अपने आप से कुछ भी नही कर पा रही है
उसमें ताकत नही रही
बहुत दिनों से रो रही थी
और, उसे शक्ति का भोजन न देकर इंजेक्शन लगा रहे थे
ये बहुत नुकसान दायक होता है
इससे कमजोरी आती है
मौत भी हो सकती है
उसे मैंने चने का सूप देने कही थी
पर वे लोग बिलुल नही सुनते थे अब माँ मौत के मुहाने पर है
वो असमय मौत के पास है यदि उसे एक कप दूध और चने का सूप देते तो, उसे तत्काल एनर्जी मिलती
पर वे उसे समझते थे
मेडिसिन भी इस अवस्था में बेकार साबित हो गयी
माँ बचाई जा सकती थी वे उसे बिलकुल नही सुनते थे
और कहते थे, की ये वो कहती है
जबकि, माँ को जो दिया जाये वंही वो खा सकती है
माँ की असामयिक कमजोरी और दुर्दशा के लिए वे लोग जिम्मेदार है
उन्होंने उसकी समस्या नही सुनी वे लोग उसे चिल्लाती छोड़कर
उसके कक्ष से गुजरते थे वो, रातदिन रोटी थी यदि
मई कोई सलाह नही सुनते थे और
कहते थे , कुछ हो गया तो, हम नही करेंगे
उन्होंने इसे साबित करके दिखाया
माँ उठ नही पाती थी,
कलपती रहती थी
पर वे नही सुनरही थे
माँ अपने छोटे बेटे से मोरल सुपोर्ट मांगती रही वो
छटपटाती थी, की बीटा उसे देखेगा
वे लोग नही सुन सके क्यूंकि
उन्होंने कह रखा था, की
कुछ हो गया तो हम नही करेंगे
जब माँ अपनी बीमारी व् कमजोरी में रातदिन रो रही थी
तब, छोटा भाई गांव चले गया
वंहा वक़्त गुजरता रहा
और बड़ा बीटा अपनी बीबी के साथ अपने बेटे के पास चले गया
माँ के तड़पने या रोने का कोई असर नही हुआ
वे लोग अपने करते कर्तव्य निभा चुके थे
वे पहले सेवा कर चुके थे
माँ का रोने , जीने मरने से असम्प्रक्त बेटे
अब दीदी वंहा जाकर माँ को उठा बैठा रही है
दीदी जो सबके दुःख में सहभागी होती है
उसके बच्चे नही है पर
हृदय में दया है
Tuesday, 1 March 2016
एक भय जो दिल में छिपा हो
आप हमेशा डरे से रहे
अपना हाल किसीसे न कहे
मन ही मन में जज्ब करते हो
ये डर मन से निकल दो
ये मन जो डरकर जीता है उस भय से जितना है क्यों
जबकि सबकुछ मेरे अनुसार है मुझे
इस दर को जितना है प्रार्थना करनी है मन को
समझना है
ऐसा कुछ नही ,जो हो
हालत मेरे अनुकूल है
अनुकूल रहेंगे
सबका सहयोग मिलेगा
बस , ये डर मनसे निकल दो
भय मनमें पनाह चाहे
तो , उसे पास न फटकने दो
आप हमेशा डरे से रहे
अपना हाल किसीसे न कहे
मन ही मन में जज्ब करते हो
ये डर मन से निकल दो
ये मन जो डरकर जीता है उस भय से जितना है क्यों
जबकि सबकुछ मेरे अनुसार है मुझे
इस दर को जितना है प्रार्थना करनी है मन को
समझना है
ऐसा कुछ नही ,जो हो
हालत मेरे अनुकूल है
अनुकूल रहेंगे
सबका सहयोग मिलेगा
बस , ये डर मनसे निकल दो
भय मनमें पनाह चाहे
तो , उसे पास न फटकने दो
Sunday, 28 February 2016
aangan: आजकल,जाने कितने डॉ डर डरा कर रहते है मुझे घर के ब...
aangan: आजकल,जाने कितने डॉ डर डरा कर रहते है मुझे घर के ब...: आजकल,जाने कितने डॉ डर डरा कर रहते है मुझे घर के बाजू में एक माकन बन रहा है वंही हमारे किचन का पानी जाता है, अब उसे बाजु वाले प्लाट से नि...
आजकल,जाने कितने डॉ डर डरा कर रहते है मुझे घर के बाजू में एक माकन बन रहा है वंही
हमारे किचन का पानी जाता है, अब उसे बाजु वाले प्लाट से निकलना है
बात छोटी सी है, पर घर बनाते समय की गलती है जो मेरी सेहत को घुन जैसी लगी है वो
काम हो जायेगा , पर मैं सोचती हूँ की जिस दिन ये काम होगा , मई बहुत खुश रहूंगी
जिंदादिली यंहा आकर फिस्स हो गयी है
वरना खुद को बहुत खुशमिजाज बताती थी
बस इतनी ही मुझमें जिंदादिली थी, ये अब आ गया है
अपनी उदासी से दूसरों को भी परेशान करना, कोई अच्छी बात नही
माँ बेचारी ,उसे भी फोन नही कर सकी
कभी इधर उधर भागते लगता है,
क्या ये सारे काम महत्व के है
इतना पता है, एक काम होगा तब दूसरा होगा
पहले ये सोचती थी , कि बेटे की शादी जुड़ेगी तो, बहुत हश रहूंगी
पर जो ये नया काम समने आया तो, मन वंही उलझ सा गया
बेटे का विवाह जुड़ने का आनंद भीतर ही दब गया
जो, भी हो एक ख़ुशी हो, और दूसरा काम भी सामने हो तो, कैसा अनुभव करते है
वंही आजकल, मेरे दिल के हालत है
हमारे किचन का पानी जाता है, अब उसे बाजु वाले प्लाट से निकलना है
बात छोटी सी है, पर घर बनाते समय की गलती है जो मेरी सेहत को घुन जैसी लगी है वो
काम हो जायेगा , पर मैं सोचती हूँ की जिस दिन ये काम होगा , मई बहुत खुश रहूंगी
जिंदादिली यंहा आकर फिस्स हो गयी है
वरना खुद को बहुत खुशमिजाज बताती थी
बस इतनी ही मुझमें जिंदादिली थी, ये अब आ गया है
अपनी उदासी से दूसरों को भी परेशान करना, कोई अच्छी बात नही
माँ बेचारी ,उसे भी फोन नही कर सकी
कभी इधर उधर भागते लगता है,
क्या ये सारे काम महत्व के है
इतना पता है, एक काम होगा तब दूसरा होगा
पहले ये सोचती थी , कि बेटे की शादी जुड़ेगी तो, बहुत हश रहूंगी
पर जो ये नया काम समने आया तो, मन वंही उलझ सा गया
बेटे का विवाह जुड़ने का आनंद भीतर ही दब गया
जो, भी हो एक ख़ुशी हो, और दूसरा काम भी सामने हो तो, कैसा अनुभव करते है
वंही आजकल, मेरे दिल के हालत है
Friday, 26 February 2016
Thursday, 25 February 2016
aangan: अख़बार व् टीवी से मई वंचित रहीतो, पता नहीं चला कि...
aangan: अख़बार व् टीवी से मई वंचित रही
तो, पता नहीं चला कि
...: अख़बार व् टीवी से मई वंचित रही तो, पता नहीं चला कि एक यूनिवर्सिटी में अफजल गुरु नामक आतंकी की बरसी मनाई गयी ये तो, देशद्रोही को खुला समर्...
तो, पता नहीं चला कि
...: अख़बार व् टीवी से मई वंचित रही तो, पता नहीं चला कि एक यूनिवर्सिटी में अफजल गुरु नामक आतंकी की बरसी मनाई गयी ये तो, देशद्रोही को खुला समर्...
अख़बार व् टीवी से मई वंचित रही
तो, पता नहीं चला कि
एक यूनिवर्सिटी में अफजल गुरु नामक आतंकी की बरसी मनाई गयी
ये तो, देशद्रोही को खुला समर्थन था
साथ ही, आँखें दिखने का बहाना कि
जो भी वे करेंगे उन्हें कोई रोक नही सकता
सीना ठोककर , देशद्रोह पर उतारू
ऐसे लोग जिन्हे देश से ज्यादा
उसपार वालों की परवाह
वे किसी आतंकी संगठन से मिले लगे
लगा उन्हें वंहा से फंडिंग मिल रही हो
सोसाइल साइट्स पर भी आँखें दिखा कर
पूरी ढीठता के साथ
अपने देशद्रोह के अजेंडे को
लागु करते हुए
वे छात्र संघ के रहनुमा
जिन्हे कुछ राष्ट्रीय पार्टियों की शाह व् समर्थन मिला हुआ है
ये है, एक देशद्रोही की याद में कल्पने वाले
और, संघ को दुत्कारने
हिन्दुओं को दुर्दुराने वाले
पाक-परास्त
सबके सब है
मस्त
और चाहते है करना
राष्ट्रवादियों को प सत
तो, पता नहीं चला कि
एक यूनिवर्सिटी में अफजल गुरु नामक आतंकी की बरसी मनाई गयी
ये तो, देशद्रोही को खुला समर्थन था
साथ ही, आँखें दिखने का बहाना कि
जो भी वे करेंगे उन्हें कोई रोक नही सकता
सीना ठोककर , देशद्रोह पर उतारू
ऐसे लोग जिन्हे देश से ज्यादा
उसपार वालों की परवाह
वे किसी आतंकी संगठन से मिले लगे
लगा उन्हें वंहा से फंडिंग मिल रही हो
सोसाइल साइट्स पर भी आँखें दिखा कर
पूरी ढीठता के साथ
अपने देशद्रोह के अजेंडे को
लागु करते हुए
वे छात्र संघ के रहनुमा
जिन्हे कुछ राष्ट्रीय पार्टियों की शाह व् समर्थन मिला हुआ है
ये है, एक देशद्रोही की याद में कल्पने वाले
और, संघ को दुत्कारने
हिन्दुओं को दुर्दुराने वाले
पाक-परास्त
सबके सब है
मस्त
और चाहते है करना
राष्ट्रवादियों को प सत
aangan: एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँतो,...
aangan: एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँ
तो,...: एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँ तो, गहन संतुष्टि मिलती है जिंदगी में मैं इसी तरह से व्यस्त रही और घर में अस्त-व्यस्त रही ...
तो,...: एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँ तो, गहन संतुष्टि मिलती है जिंदगी में मैं इसी तरह से व्यस्त रही और घर में अस्त-व्यस्त रही ...
एक बेचैनी सी दिल में हरदम तारी रहती है लिख लूँ
तो, गहन संतुष्टि मिलती है
जिंदगी में मैं इसी तरह से व्यस्त रही
और घर में अस्त-व्यस्त रही
आजकल, ब्लॉग लिख कर ख़ुशी महसूस करती हूँ
की, कमसे कम २०-२२ pageview तो होते है
अभी एक लड़की कैफ़े में आई
खुश दिल , खुले दिल की
सारी बातें हंसी में बोलती हुई
मुझे लगा , मैं भी पहले इसी तरह मजाक में बोला करती थी
फिर जीवन में घटना क्रम इस तरह उलझा कि
रहने लगी
आप गंभीर नही रहते ,
हो जाते है
अपने आप होती है तब्दीली
तो, गहन संतुष्टि मिलती है
जिंदगी में मैं इसी तरह से व्यस्त रही
और घर में अस्त-व्यस्त रही
आजकल, ब्लॉग लिख कर ख़ुशी महसूस करती हूँ
की, कमसे कम २०-२२ pageview तो होते है
अभी एक लड़की कैफ़े में आई
खुश दिल , खुले दिल की
सारी बातें हंसी में बोलती हुई
मुझे लगा , मैं भी पहले इसी तरह मजाक में बोला करती थी
फिर जीवन में घटना क्रम इस तरह उलझा कि
रहने लगी
आप गंभीर नही रहते ,
हो जाते है
अपने आप होती है तब्दीली
Wednesday, 24 February 2016
aangan: जो भारत का इतिहासमई लिखूंगी, मई से वो, हिन्दुओं...
aangan: जो भारत का इतिहास
मई लिखूंगी, मई से
वो, हिन्दुओं...: जो भारत का इतिहास मई लिखूंगी, मई से वो, हिन्दुओं के नज़रिये से होगा मुझे लगता है हम हिन्दुओं के साथ सबसे ज्यादा अन्याय किया है इस इ...
मई लिखूंगी, मई से
वो, हिन्दुओं...: जो भारत का इतिहास मई लिखूंगी, मई से वो, हिन्दुओं के नज़रिये से होगा मुझे लगता है हम हिन्दुओं के साथ सबसे ज्यादा अन्याय किया है इस इ...
जो भारत का इतिहास
मई लिखूंगी, मई से
वो, हिन्दुओं के नज़रिये से होगा
मुझे लगता है हम हिन्दुओं के साथ
सबसे ज्यादा अन्याय किया है
इस इतिहास का दूसरा नाम होगा
pride of indiya
इसमें विक्रमादित्य , हर्षवर्धन
व् समुद्रगुप्त जैसे सम्राटों को
मैं सबके सामने लाऊंगी
जो, इतिहास हमेशा मुग़ल काल में
सिमट जाता है, उसे
मैं पृथ्वीराज और समुद्रगुप्त विजय के साथ हर्षवर्धन
व् विक्रमादित्य के स्वर्णयुग के साथ
सबके समक्ष लाऊंगी
मई लिखूंगी, मई से
वो, हिन्दुओं के नज़रिये से होगा
मुझे लगता है हम हिन्दुओं के साथ
सबसे ज्यादा अन्याय किया है
इस इतिहास का दूसरा नाम होगा
pride of indiya
इसमें विक्रमादित्य , हर्षवर्धन
व् समुद्रगुप्त जैसे सम्राटों को
मैं सबके सामने लाऊंगी
जो, इतिहास हमेशा मुग़ल काल में
सिमट जाता है, उसे
मैं पृथ्वीराज और समुद्रगुप्त विजय के साथ हर्षवर्धन
व् विक्रमादित्य के स्वर्णयुग के साथ
सबके समक्ष लाऊंगी
Tuesday, 23 February 2016
Monday, 22 February 2016
aangan: माँ के बेतहाशा रोनेऔर कराहने के बीचमेरे फोन का ब...
aangan: माँ के बेतहाशा रोने
और कराहने के बीच
मेरे फोन का ब...: माँ के बेतहाशा रोने और कराहने के बीच मेरे फोन का बैलेंस माँ के लिए एक कामवाली को तलाश रही हूँ जो, गांव में रहकर उसे सहारा दे सके क्यू...
और कराहने के बीच
मेरे फोन का ब...: माँ के बेतहाशा रोने और कराहने के बीच मेरे फोन का बैलेंस माँ के लिए एक कामवाली को तलाश रही हूँ जो, गांव में रहकर उसे सहारा दे सके क्यू...
Sunday, 21 February 2016
Friday, 19 February 2016
माँ से ल बात हुई , और सब कुछ द्रवित करने वाला था
भाई को भी परेशानी, भाभी के भी सपने चुरचूर कुछ समझ नही आ रहा
माँ का पांव नही उठता और वो, रोटी और कराहती रहती है
पांव नही उठता , वंही व्हील चेयर पर बाथरूम में भी उसे तकलीफ है पांव जो नही उठता
ये घिसटती तड़पती जिंदगी
पहले की उत्साही माँ याद आती है जो दौड़कर घरके काम करती थी
अब वो दूसरों के वष में है, परवश है
क्या करेगी, यदि जीना नही चाहती तब भी जीना है मई लगातार ईश्वर का स्मरण करती हूँ
कई भगवन उसे या तो, ठीक करो, या उठा लो
भाई-भाभी भी इस तकलीफ से नींद नही ले पाते
जो , भाई ड्यूटी में है, वो विवश हो कहता है
माँ अं थक गयी है .......... शरीर भी जब बोझ बन जाता है
भाई को भी परेशानी, भाभी के भी सपने चुरचूर कुछ समझ नही आ रहा
माँ का पांव नही उठता और वो, रोटी और कराहती रहती है
पांव नही उठता , वंही व्हील चेयर पर बाथरूम में भी उसे तकलीफ है पांव जो नही उठता
ये घिसटती तड़पती जिंदगी
पहले की उत्साही माँ याद आती है जो दौड़कर घरके काम करती थी
अब वो दूसरों के वष में है, परवश है
क्या करेगी, यदि जीना नही चाहती तब भी जीना है मई लगातार ईश्वर का स्मरण करती हूँ
कई भगवन उसे या तो, ठीक करो, या उठा लो
भाई-भाभी भी इस तकलीफ से नींद नही ले पाते
जो , भाई ड्यूटी में है, वो विवश हो कहता है
माँ अं थक गयी है .......... शरीर भी जब बोझ बन जाता है
Thursday, 18 February 2016
बुआ जी के घर बिताये दिन क्या भूलने लगी हूँ, ४० वर्ष पहले यादों का अब क्या महत्व , सब इन्ही कहेंगे, कि आज मई जब वंहा नही, तो यादों में भी क्यों जाती हूँ. और वो घर जन्हा मई और बुआ ही रहते थे. दिन भर मई अपनी कक्षा की पढाई में व् खेलकूद में मग्न रहती थी . और साँझ जब बुआ जी रसोई कर चुकी होती , तो, वे फिर साँझा आरती करती थी. मई भी आरती के वक़्त उनके पास आ जाती, और आरती गाने लगती थी. वह समय आज तक स्मृति में ,कि बहुत शांति होती थी, जिसे नीरवता कहते.
हम आरती गए रहे होते थे
और कोई अंजाना सा भय भी भीतर महसूस होता था, जाने कौन सा साया था, की कई बार गाते हुए भी सिहरन महसूस . शायद बुआ जी की सौत के अचानक मर जाने से मन में डॉ समा गया हो , पर वो कांपती सी आरती की लौ जैसी मई भावना को आज भी महसूस करती हूँ .
हम आरती गए रहे होते थे
और कोई अंजाना सा भय भी भीतर महसूस होता था, जाने कौन सा साया था, की कई बार गाते हुए भी सिहरन महसूस . शायद बुआ जी की सौत के अचानक मर जाने से मन में डॉ समा गया हो , पर वो कांपती सी आरती की लौ जैसी मई भावना को आज भी महसूस करती हूँ .
Thursday, 4 February 2016
Tuesday, 2 February 2016
Sunday, 31 January 2016
मई
उस चौक से गुजर रही थी
वो, चौक पर नाले एक चौकोर पत्थर पर
एक ४५ स्त्री कम कपड़ों में
वंहा लेती थी अलमस्त
दुनिया के रंजोगम अलहदा
न शर्म लिहाज तमगा
न कोई चिता फ़िक्र
जैसे खुले आसमान निचे
ईश्वर की दुआओं को सहेजती
एक बोतल में पानी बाजु में रखे
मई सिहर उठी
जाने कितने दिनों भूखी
अपनों से ठुकराई
कपडे तक नहीं
पत्थर पर यूँ ही लेटे हुए
सब दुखों को नाले में फेंककर
किसी से कोई शिकायत नहीं
उसकी समझ से दूर
और , वो कोई वोटबैंक
जिसे सरकारी मदद मिले
वो, स्त्री बेचारी भी नहीं समझती
जरूरतों से बची हुयी
किसी संत महात्मा तपस्वी जैसी
जिसने जीवन को
अनजाने में साध लिया हो
उस चौक से गुजर रही थी
वो, चौक पर नाले एक चौकोर पत्थर पर
एक ४५ स्त्री कम कपड़ों में
वंहा लेती थी अलमस्त
दुनिया के रंजोगम अलहदा
न शर्म लिहाज तमगा
न कोई चिता फ़िक्र
जैसे खुले आसमान निचे
ईश्वर की दुआओं को सहेजती
एक बोतल में पानी बाजु में रखे
मई सिहर उठी
जाने कितने दिनों भूखी
अपनों से ठुकराई
कपडे तक नहीं
पत्थर पर यूँ ही लेटे हुए
सब दुखों को नाले में फेंककर
किसी से कोई शिकायत नहीं
उसकी समझ से दूर
और , वो कोई वोटबैंक
जिसे सरकारी मदद मिले
वो, स्त्री बेचारी भी नहीं समझती
जरूरतों से बची हुयी
किसी संत महात्मा तपस्वी जैसी
जिसने जीवन को
अनजाने में साध लिया हो
Friday, 29 January 2016
bnaras ki byar: ओ नीली चुनर वाली मदमस्त निगाहों वाली जा दूर रहके...
bnaras ki byar: ओ नीली चुनर वाली
मदमस्त निगाहों वाली
जा दूर रहके...: ओ नीली चुनर वाली मदमस्त निगाहों वाली जा दूर रहके देखले गर मेरे प्यार के बिन तेरा गुजर हो जाये तो
मदमस्त निगाहों वाली
जा दूर रहके...: ओ नीली चुनर वाली मदमस्त निगाहों वाली जा दूर रहके देखले गर मेरे प्यार के बिन तेरा गुजर हो जाये तो
Wednesday, 27 January 2016
Tuesday, 26 January 2016
बहुत चाहकर भी ज्यादा नही लिख सकी हूँ, नए सिरे से संघर्ष है
लिखने के क्षेत्र में बहुत निराशा है, बहुत ऊर्जा , धन व् समय लगता है, बदले में कुछ नही मिलता, यदि इतने वक़्त में चाय की दुकान चलाये लेखन से ज्यादा कमा सकते है
लिखने में कुछ आजकल मिलता नही , सब रचनाएँ जो भेजो वो, खो जाती है, लेखक दिल मसोस कर रह जाता है, किस्से दिल का हाल कहे , सब निकम्मा व् जाहिल समझते है , बेचारा दिन-हीन लेखक
लिखने के क्षेत्र में बहुत निराशा है, बहुत ऊर्जा , धन व् समय लगता है, बदले में कुछ नही मिलता, यदि इतने वक़्त में चाय की दुकान चलाये लेखन से ज्यादा कमा सकते है
लिखने में कुछ आजकल मिलता नही , सब रचनाएँ जो भेजो वो, खो जाती है, लेखक दिल मसोस कर रह जाता है, किस्से दिल का हाल कहे , सब निकम्मा व् जाहिल समझते है , बेचारा दिन-हीन लेखक
Thursday, 21 January 2016
माएं इश्लीए होती है , कि वे दुआ करती है, मन्नत मांगती है कि उसके बच्चों का जीवन सही पटरी पर चले , माँ से सबको शिकायत हो जाती है, जब वो वृद्ध हो जाती है , पर माँ को अपने बच्चों से कभी कोई शिकायत नही होती , वो सब जगह जाकर माथा टेक आती है , हाथ उठकर, उपर वाले से प्रार्थना करती है
माँ की आवाज थरथराती है देह भी जाड़े से अकड़ी जाती है, बहुत ठण्ड लगती है ,कहती है, कभी नींद न आने की शिकायत। ..... जो भी हो, माँ के होने से लगता है, हम भी कुछ है, उसकी आँखों में अपने बच्चों को देख ऐसी चमक उभरती है, और वो, हमारे लिए जीवित रहती है , हम माँ को फिर भी कभी कोई उपहार नही देते।
माँ की आवाज थरथराती है देह भी जाड़े से अकड़ी जाती है, बहुत ठण्ड लगती है ,कहती है, कभी नींद न आने की शिकायत। ..... जो भी हो, माँ के होने से लगता है, हम भी कुछ है, उसकी आँखों में अपने बच्चों को देख ऐसी चमक उभरती है, और वो, हमारे लिए जीवित रहती है , हम माँ को फिर भी कभी कोई उपहार नही देते।
Tuesday, 19 January 2016
aangan: फेसबुक फेसबुक पर रोजाना अपने पाठको के साथ बात होती...
aangan: फेसबुक
फेसबुक पर रोजाना अपने पाठको के साथ बात होती...: फेसबुक फेसबुक पर रोजाना अपने पाठको के साथ बात होती है, ब्लॉग से कल, अचानक सोनू ने चिड़िया का घोसला तोड़ दिया, हल्की बारिश और ठण्ड में मै...
फेसबुक पर रोजाना अपने पाठको के साथ बात होती...: फेसबुक फेसबुक पर रोजाना अपने पाठको के साथ बात होती है, ब्लॉग से कल, अचानक सोनू ने चिड़िया का घोसला तोड़ दिया, हल्की बारिश और ठण्ड में मै...
फेसबुक
फेसबुक पर रोजाना अपने पाठको के साथ बात होती है, ब्लॉग से
कल, अचानक सोनू ने चिड़िया का घोसला तोड़ दिया, हल्की बारिश और ठण्ड में मैं उदाश हो गयी थी ये सबके साथ होता है, कि बसेरे के लिए हम चिंतित होते है
हमे चिड़ियों को घोसला बनाने देना है उन्हें घर देना है, दाना पानी भी
क्यूंकि, आजकल, घोसले जन्हा होते, वे दरख़्त कटे है , इसे रोकना है
फेसबुक पर रोजाना अपने पाठको के साथ बात होती है, ब्लॉग से
कल, अचानक सोनू ने चिड़िया का घोसला तोड़ दिया, हल्की बारिश और ठण्ड में मैं उदाश हो गयी थी ये सबके साथ होता है, कि बसेरे के लिए हम चिंतित होते है
हमे चिड़ियों को घोसला बनाने देना है उन्हें घर देना है, दाना पानी भी
क्यूंकि, आजकल, घोसले जन्हा होते, वे दरख़्त कटे है , इसे रोकना है
Saturday, 16 January 2016
Wednesday, 13 January 2016
aangan: जब कपड़ो के ढेर देखती हूँ तो, गांव की यात्रा में स...
aangan: जब कपड़ो के ढेर देखती हूँ तो, गांव की यात्रा में स...: जब कपड़ो के ढेर देखती हूँ तो, गांव की यात्रा में सहित में ठिठुरते दिन में मैंने उसे बिना ब्लौस देखि थी, मात्र चिथड़ों में देह लिपटे हुए, बेच...
जब कपड़ो के ढेर देखती हूँ तो, गांव की यात्रा में सहित में ठिठुरते दिन में मैंने उसे बिना ब्लौस देखि थी, मात्र चिथड़ों में देह लिपटे हुए, बेचारी जाने कहा से आ रही थी, हम कितने कपड़ो से अपने को ठण्ड से बचते है, और वे पगली औरतें अपने को ठण्ड से भी ज्यादा लोगों की नज़र से बचना चाहती है
वे घर से निकल दी गयी औरतें, कंहा जाये , इस दिन दुनिया में कोई भी उनका नही होता
गांव की ही पूर्णः याद आती है, जिसे उसके ससुराल वालों ने इज्ज्ज़त लूट के निकला, जब मायके आई तो, बाप व् भाइयों ने भी लूटा , फिर मायके वालों ने भी उसे घर से निकल डाला , कनहा जाती वो, बाजार टेकरा में रहती , पर वंहा भी लूटने वालों का ताँता लगा रहता था , कोई अपना नही, पर इज्जत लूटने सब हाजिर
वो, कुछ माहों में गर्भवती हो जाती , पर उसे गर्भ गिरा देते थे
गांव में शर्म लिहाज की दुहाई कौन देता , सब जैसे निर्ल्लज होकर, पूर्णा का तमाशा देखते थे
पूरी जिंदगी एक हरी साडी से तन ढकती , अंत में अस्पताल गयी, और जिले में एक लावारिश मौत , जो गांव की पहचान बन चुकी थी
इन्ही, नही मैंने एक जीप में कुछ लोगों को एक लड़की को बांधकर ले जाते देखा था, मैं बोल उठी थी, की उसमे लड़की बंधी है
पर, मेरी आवाज कंही नही पहुंची थी, मैं खुद बंधक जैसे जीवन में थी, जो लोग लड़कियां उठा लेते है, वे बहुत राशुख वाले होते है , उन्हें रोकना सबके बुते की बात नही, ये घटना २५ वर्ष पुरानी है, पर लड़की का दर्द वन्हीं है , सामूहिक व् संगठित रूप से जो लड़कियों को उठाते व् उनकी मिलकर इज्जत लूटते है, उन्हें रोकना जरुरी है
मैंने गोंदिया रेल में एक युवती की लाश का चित्र देखि थी, जो पुलिस ने लगाया था
फिर मैंने गोरखपुर जाते वक़्त जब एक पगली को दबंगो द्वारा गाली गलौज देते सुनी थी, तो मैंने प्रधानमंत्री जी को लिखा था ,पत्र भी आया है, उसका, विशेष दस्ता लगाया जा रहा है, पर हमें बच्चियों को सामूहिक लुटेरों से बचना ही होगा
वे घर से निकल दी गयी औरतें, कंहा जाये , इस दिन दुनिया में कोई भी उनका नही होता
गांव की ही पूर्णः याद आती है, जिसे उसके ससुराल वालों ने इज्ज्ज़त लूट के निकला, जब मायके आई तो, बाप व् भाइयों ने भी लूटा , फिर मायके वालों ने भी उसे घर से निकल डाला , कनहा जाती वो, बाजार टेकरा में रहती , पर वंहा भी लूटने वालों का ताँता लगा रहता था , कोई अपना नही, पर इज्जत लूटने सब हाजिर
वो, कुछ माहों में गर्भवती हो जाती , पर उसे गर्भ गिरा देते थे
गांव में शर्म लिहाज की दुहाई कौन देता , सब जैसे निर्ल्लज होकर, पूर्णा का तमाशा देखते थे
पूरी जिंदगी एक हरी साडी से तन ढकती , अंत में अस्पताल गयी, और जिले में एक लावारिश मौत , जो गांव की पहचान बन चुकी थी
इन्ही, नही मैंने एक जीप में कुछ लोगों को एक लड़की को बांधकर ले जाते देखा था, मैं बोल उठी थी, की उसमे लड़की बंधी है
पर, मेरी आवाज कंही नही पहुंची थी, मैं खुद बंधक जैसे जीवन में थी, जो लोग लड़कियां उठा लेते है, वे बहुत राशुख वाले होते है , उन्हें रोकना सबके बुते की बात नही, ये घटना २५ वर्ष पुरानी है, पर लड़की का दर्द वन्हीं है , सामूहिक व् संगठित रूप से जो लड़कियों को उठाते व् उनकी मिलकर इज्जत लूटते है, उन्हें रोकना जरुरी है
मैंने गोंदिया रेल में एक युवती की लाश का चित्र देखि थी, जो पुलिस ने लगाया था
फिर मैंने गोरखपुर जाते वक़्त जब एक पगली को दबंगो द्वारा गाली गलौज देते सुनी थी, तो मैंने प्रधानमंत्री जी को लिखा था ,पत्र भी आया है, उसका, विशेष दस्ता लगाया जा रहा है, पर हमें बच्चियों को सामूहिक लुटेरों से बचना ही होगा
aangan: कल मकर संक्राति होगी, परसो भी, ऐसे में बुआ जी और...
aangan: कल मकर संक्राति होगी, परसो भी, ऐसे में बुआ जी और...: कल मकर संक्राति होगी, परसो भी, ऐसे में बुआ जी और माँ याद अ रही है, बुआ जी , तो एक दिन पहले ही अकेले ही दो-३ तरह के लड्डू बनाती थी,और सबको...
कल मकर संक्राति होगी, परसो भी, ऐसे में बुआ जी और माँ याद अ रही है, बुआ जी , तो एक दिन पहले ही अकेले ही दो-३ तरह के लड्डू बनाती थी,और सबको बांटती थी, जो अपने लिए बनाते वंही कंवलों काम करने वालों को बंटते थे ,और घर का आँगन से लेकर भीतरी कक्ष तक तिल के भुनने की सोंधी महक फैली होती थी
और कितने पक्षी हमारे इर्द-गिर्द के परिवेश में जैसे नेपथ्य का संगीत रचते थे, आज वह संगीत कंही खो सा गया है, वो संगीत गाने वाले जिंदगी को गुनगुनाने वाले पक्षी भी तो नही रहे , एकाध कंही से आँगन में आ जाता है, तो आँखें भींग जाती है, की हमने पक्षियों के घर-घोसले दरख्तों को मिटा दिए है, ये सब क्यों, की हमे ऐसे सुने घर चाहिए, जन्हा न तो असली ऊल होंगे, न पक्षियों के बसेरे , जो सबेरे अपने घोसलों से निकल कर जाने कहा उड़कर जाते है, और साँझ ढलने के पहले लौट आते है,
मेरा मन होता है, ये पखेरुओं त्तं, कौन देश जाते हो.....
तिनका तिनका जोड़कर घर बनाने की कला भी तो, इन्ही पखेरुओं से आती है
दरअसल बुआ जी के घर हम जन्हा रहते थे , वंहा इर्द-गिर्द पेड़ों व् लतरों के झुरमुट थे, वंहा सब कुछ था, रीठे का पेड़, जिसे हम पानी से भिगो कर साबुन जैसा झाग निकालते थे, पर उपयोग नही पता था, आज मालूम है, तो रीठे का झाड़ नज़र नही आता , कितने दरिद्र हो गए है हम, खलिश घर बनाने के लिए, सब- उजड़ने पर तुले है, कितने स्वार्थी हो गए है, अपने सुखो-आराम के लिए , पेड़ों व् प्राणियों की कितनी प्रजातियों को लुप्त कर गए. पक्षियों का अत-पता नही मिला , मैं बालाघाट से बनारस तक गगयी , पर पक्षी अब पूर्व-वत नही रहे, इधर गांव व् वनों में पक्षी शिकार किये जा रहे है, कुछ एक्सपोर्ट हो रहे है आप तो, सब-कुछ जानते है
अच्छा आप ये बताईये , कि आपने कंही जुगनू को देखा है, मैं अपने किशोरावस्था में एक नदी किनारे के गांव गयी थी, वंहा इतने जुगनू थे , ओह
आज हम इन सबसे महरूम हो गए है, जिन्हे हम बचा सकते थे, यदि पेड़ों के झुरमुट बचा सके तो। ..........
और कितने पक्षी हमारे इर्द-गिर्द के परिवेश में जैसे नेपथ्य का संगीत रचते थे, आज वह संगीत कंही खो सा गया है, वो संगीत गाने वाले जिंदगी को गुनगुनाने वाले पक्षी भी तो नही रहे , एकाध कंही से आँगन में आ जाता है, तो आँखें भींग जाती है, की हमने पक्षियों के घर-घोसले दरख्तों को मिटा दिए है, ये सब क्यों, की हमे ऐसे सुने घर चाहिए, जन्हा न तो असली ऊल होंगे, न पक्षियों के बसेरे , जो सबेरे अपने घोसलों से निकल कर जाने कहा उड़कर जाते है, और साँझ ढलने के पहले लौट आते है,
मेरा मन होता है, ये पखेरुओं त्तं, कौन देश जाते हो.....
तिनका तिनका जोड़कर घर बनाने की कला भी तो, इन्ही पखेरुओं से आती है
दरअसल बुआ जी के घर हम जन्हा रहते थे , वंहा इर्द-गिर्द पेड़ों व् लतरों के झुरमुट थे, वंहा सब कुछ था, रीठे का पेड़, जिसे हम पानी से भिगो कर साबुन जैसा झाग निकालते थे, पर उपयोग नही पता था, आज मालूम है, तो रीठे का झाड़ नज़र नही आता , कितने दरिद्र हो गए है हम, खलिश घर बनाने के लिए, सब- उजड़ने पर तुले है, कितने स्वार्थी हो गए है, अपने सुखो-आराम के लिए , पेड़ों व् प्राणियों की कितनी प्रजातियों को लुप्त कर गए. पक्षियों का अत-पता नही मिला , मैं बालाघाट से बनारस तक गगयी , पर पक्षी अब पूर्व-वत नही रहे, इधर गांव व् वनों में पक्षी शिकार किये जा रहे है, कुछ एक्सपोर्ट हो रहे है आप तो, सब-कुछ जानते है
अच्छा आप ये बताईये , कि आपने कंही जुगनू को देखा है, मैं अपने किशोरावस्था में एक नदी किनारे के गांव गयी थी, वंहा इतने जुगनू थे , ओह
आज हम इन सबसे महरूम हो गए है, जिन्हे हम बचा सकते थे, यदि पेड़ों के झुरमुट बचा सके तो। ..........
Sunday, 10 January 2016
माँ बीमार है, और बहुत ,बहुत सारी बातें आज याद आ रही है, जब मई बुआ जी के यंहा से माँ के घर गयी, तो, वंहा जैसे प्राकृतिक वैभव बिखरा था, याद करती हूँ, इन ठण्ड के मौसम में तिल की फसल आँगन में आ चुकी होती थी, घर के पाटन पर धान के बोरे चढ़ाते नौकर, एक बार एक बेचारे नौकर ने सिपाही जैसी पेंट क्या पहनी, माँ की हंसी थमने का नाम नही लेती थी, माँ। .... ओह घर में कितना कुछ था, सब और सात्विकता और वैभव , वो भी बिना अहंकार और प्रदर्शन के। .....
खेतों में शीला बीनने जाती थी, एक गरीब स्त्री, ढेर से बच्चे उसके संग रहते थे
और, वंही खेत से लौटते मैदानों में कुछ पत्थर निकालते वे पसीना बहते मजदुर , एक पत्थर निकलने में सुबह से साँझ हो जाती थी, और २ रुप्पल्लि भी हाथ में नही आती थी, क्या वक़्त था वो
फिर भी हाथों पर हास का उजास फैला रहता था
क्या क्या बताऊँ उस युग की बातें , सच माँ तुम्हारा वो वक़्त कहा लौट सकता है हममें वो म्हणत की कुवट नही और, माँ-बाबूजी, नौकर-चाकर सबके साथ खेती-बाड़ी में मस्त रहते थे , माँ।
खेतों में शीला बीनने जाती थी, एक गरीब स्त्री, ढेर से बच्चे उसके संग रहते थे
और, वंही खेत से लौटते मैदानों में कुछ पत्थर निकालते वे पसीना बहते मजदुर , एक पत्थर निकलने में सुबह से साँझ हो जाती थी, और २ रुप्पल्लि भी हाथ में नही आती थी, क्या वक़्त था वो
फिर भी हाथों पर हास का उजास फैला रहता था
क्या क्या बताऊँ उस युग की बातें , सच माँ तुम्हारा वो वक़्त कहा लौट सकता है हममें वो म्हणत की कुवट नही और, माँ-बाबूजी, नौकर-चाकर सबके साथ खेती-बाड़ी में मस्त रहते थे , माँ।
Friday, 8 January 2016
Thursday, 7 January 2016
Sunday, 3 January 2016
Subscribe to:
Comments (Atom)