Saturday, 27 December 2014

माँ
माँ जिसने जन्म दिया 
कितनी मुश्किल भरी जिंदगी थी उसकी 
 सुबह से आज उसे चक्र भी नही बात कर सकी हूँ 
अब, घर जाते ही, माँ से फोन पर बात करूंगी 
मेरा जन्म जब हुआ 
माँ आज भी बताती है की १५ दिन बाद तिल-संक्रात आई थी 
माँ को बुआ जी तब मेथी के कड़वे लड्डू खिलाती थी 
नन्द के घर कोई नखरे नही चलते थे 
जचकी के १५ दिन बाद सब काम करने होते थे 
माँ ने हम ७ बहन-भाइयों को जन्म दिया 
वो, कितने कठिनाई से दूसरों के घर हमे देखती रही होगी 
बड़े घरों में बड़े काम होते है 
माँ को भी पल भर अपने लिए नही मिलता था मुझे 
तब कौन देखता 
बुआ जी मुझे अपने साथ ले गयी थी 
तब, मई डेढ़ बरस की भी नही थी 
 गए है , दिन बिट गए है 
तो, चलूँ, 
माँ से बाटे , ये……। 
मई भी दिन भर से आज थक गयी हूँ 

Saturday, 20 December 2014

मेरे छोटे से शहर में 
जब, दिन-दोपहर को मई बाजार से गुजरती हूँ 
तो, वंहा , एक वृद्धा को 
जो, की अंधी भी है 
मई हमेशा 
उस बेचारी कमजोर बूढी स्त्री को 
दो, तीन थैले हाथों में टाँगे 
एक, हाथ में लकड़ी से टेक लेकर 
झुकी कमर से 
गुजरते देखती हूँ 
वो, हे राम की टेर  लगाती 
लाठी टेकती 
थैलों के बोझको , संभाले 
कैसे गुजरती है 
फिर भी उसे नही है 
किसी से शिकायत 
और वो, नही है 
मतदान का कार्ड 
सच, लोगों के दिल कितने कमजोर है 
काश, जो धर्म पर लड़ते है 
ऐसे बेसहारा वृद्ध स्त्रियों को 
कोई , आश्रय देते 
और मंदिरों व् मजारों पर आ रही 
राशि से 
इन्हे भी खाने मिलता 
ये क्या भीख मांगते 
हमारे समाज को गौरवन्वित करते है 
२ 
एक, जवान स्त्री को देखा 
जो, अस्तव्यस्त हालत में 
पोटली की शक्ल में 
थोड़े से कपडे समेटे 
बेपरवाह सी 
सड़क के चौराहे पर 
बैठी है 
कुछ चकराई सी 
ये सोचती-बुझती 
कि 
वो, अब कहा जाएगी 
इस दुनिया में 
उसका कोई भी तो नही 

Wednesday, 17 December 2014

bnaras ki byar: bnaras ki byar

bnaras ki byar: bnaras ki byar: मैंने कभी बनारस देखा नही ,बस सुना व् पढ़ा करती थी, शरद के नोवेल व् रविन्द्र की कथा में कुछ झलक पाई थी. किन्तु कोई राग नही था, महाभारत के क...

Sunday, 14 December 2014

माँ
माँ सच्ची साधक है 
एक बार मई गर्मी में गयी थी गांव 
तो, आम की अमराई से 
कोयल की कूक सुनाई दे रही थी 
तब, माँ बोली थी 
किसी कवि की मराठी में कविता थी 
जिसका अनुवाद माँ ने बताया था 
की, ये कोयल 
तू क्यों इतना मीठा गाती है 
तेरी मीठी बोली को सुनने वाले यंहा कौन है 
मई माँ की बात का निहितार्थ समझ गयी थी 
माँ ,तुमने कविता के माध्यम से अपनी बात राखी थी 
माँ, सरस्वती तुम्हारे जिन्हा में वास करती है 
तुम कितना जानती हो, जो 
हमे कुछ भी याद नही 
जो, तुम इतना सुंदर कविता कहती हो 

Sunday, 7 December 2014

माँ 
माँ कितने दोहे गाती है 
एक दोहा याद आ रहा है 
जो , माँ कहती थी 
दया धर्म का मूल है , पाप मूल अभिमान 
तुलसी दया ना छोड़िये , जबतक घट में प्राण 

Monday, 24 November 2014

 बुआ जी 
आज आपकी बहुत याद आती है 
मई उस गांव तक गयी थी 
जन्हा से बचपन में मई 
आपके साथ , बैलगाड़ी में जाती थी जब, मई छोटी सी थी 
तभी से उन राहों से आपके संग जाती थी 
और , मुझे वो मंदिर बहुत बड़ा लगता था 
वंहा श्रद्धालुओं की पंक्ति खड़े होकर 
प्रार्थना करती थी 
अब वो सब नही है 
बहुत वक़्त गुजर चूका है 
बुआ जी, आप बहुत दूर चली गयी हो 
सिर्फ आपकी यादें है 
वे रस्ते , अब वंहा नही जाउंगी 
मुझे अपने बेटे का जीवन संवरना है इश्लीए 
सब भुला के 
नई खुशियों को आमंत्रित करना चाहती हूँ 
बुआ जी आप भी मेरे घर में खुशियों को सहेजते देखना चाहती हो 
आपका आशीर्वाद व् दुआएं मेरे साथ है 
मई, जरूर सफल होउंगी 
इश्लीए, मैंने, 
वंहा मंदिर में अपने बचपन के साथी 
कृष्ण से प्रार्थना की है 

Saturday, 22 November 2014

बबचपन 

बचपन का साथी , है मेरा गांव 
कल , मई अपने बचपन के गांव गयी थी, 
उन राहों से गुजरते जो अनुभूति हो रही थी 
उसे शब्दों में बंधना संभव नही 
बीएस यूँ लग रहा था, 
कितने बरसों पहले , यंहा से मेरे जीवन की यात्रा आरम्भ हुई थी 
बाबूजी के गांव से बुआजी के गांव के बीच मेरा आना जाना लगा रहा था 
वंही रस्ते इ एक मंदिर मिलता था 
मंभाव पंथ का छोटा सा नदिर 
समाज की विविधता को अपने में समेटे , 
गांव का जीवन 
वो, मंदिर मेरी स्मृतिओं में बचा रहा 
कल, बेटे संग उसे देखने निकली 
और वंहा पहुँच कर पल, भर को लगा की 
अपने विगत जीवन में पहुँच गयी हूँ 
जन्हा बुआ जी के संग मई बैलगाड़ी से जाती थी, 
और वो, मंदिर आरतियों से गूंजता होता था 
कितना छोटा सा मंदिर 
किन्तु, आस्था उतनी ही प्राचीन और विराट 
मन को बहुत शांति महसूस होती रही 
क्रमशः 

Wednesday, 19 November 2014

रतरात बहुत ज्यादा ठण्ड थी 
माँ की बार बार याद आती रही 
माँ को बहुत जाड़ा लगता है 
माँ को गर्म कपडे मिलने चाहिए 
सुबह उठकर 
अपने इंस्पेक्टर भाई को कॉल की 
की माँ को गर्म कपडे भेजिए 
माँ ठण्ड नही बर्दास्त कर पाती 

Wednesday, 12 November 2014

माँ के पास

माँ को देने को 
किसी के पास कुछ नही है 
न वक़्त ,
न कुछ उपहार 
ऐसे ही बिट जाते है 
रूखे-सूखे 
माँ के समस्त त्यौहार 

Monday, 3 November 2014

आधे अधूरे मन से लिखा ये ब्लॉग 
बनारस की बयार से बहुत आगे रहा है 
मन कंही लगता नही 
इधर से उधर भागता है सब कहते है 
अपने बीते दिनों को मन याद करो 
किन्तु बुआ जी को भूल जाने का मन नही होता 
उनका  स्नेह व् उनके घर का वििस्तृत आँगन याद आता है 
जन्हा हम अकेले थे 
किन्तु, मोहल्ले वाले सारा दिन व् शाम तक 
बैठने आते थे 
आज हमारे पास वत नही किन्तु तब ऐसा नही था 
सच बहुत याद आते है 
वे पुरसकुं दिन और 
उसकी यादें, मासूम सि…। 
दिल को सहलाती हुई 

Monday, 27 October 2014

आँगन
आँगन बनारस की बयार से बहुत आगे है 
आज इसकी ५०५० बार २०६ पोस्ट पढ़ी जा चुकी है 
जबकि , बनारस की बयार की १०२७ पोस्ट 
५१६९ बार पढ़ी गयी है 
आँगन को मेरी माता जी व् बुआ जी का आशीर्वाद मिला है उनका 
अकिंचन स्नेह है 
मई बहुत याद करती हूँ की 
बुआ जी के घर जैसी दिवाली थी वो, आज तक याद आती है 
तब, जो खेती की जाती थी गौएँ पाली जाती थी तब, घरों में सब कुछ 
भरा भरा सा था 
आज जो किलो के भाव से मिलता है 
तो, पैसे गिनते पसीने छुट्टे है 
तब, कुढ़ो व् पायली से 
बेहिसाब गिना जाता था आज वे शब्द हंसी का सबब बन गए 
और हम महंगाई से बदहाल हो गए हमारी ये समृद्धि तो बीएस नाम की है 
वो, तो वास्तविक थी 

Zara Nazronse Kehdojii Hemant Kumar in Bees Saal Baad

Sunday, 26 October 2014

वक़्त
वक़्त नही मिलता है 
क्योंकि, मेरे पास लैपटॉप नही है 
खरीदने की इजाजत नही है 
लिखना सिखने भी वक़्त होना 
१ ऑवर में मई सिर्फ देख सकती हूँ 
ज्यादा कुछ नही होता 
आप सब मेरी विवशता समझे की मई क्यों इतना 
ठहरा लेखन करती हूँ 
बहुत से फ़र्ज़ है 
जो निभाने है 
हिंदुस्तान का लेखक संकोची ज्यादा है 
उसे प्रोफेशनल होना होगा 
मेरी किताब, पारिजात जल्द आ रही है 
आप , सॉरी 
मेरी दूसरी किताब भी उसके बाद लाइन में है 
उसके बाद मेरे नावेल, लागि नहीं। . छूटे रामा
पर काम होगा 
इन सबमे वक़्त लगेगा 
चूँकि पहले से जो लिखा है 
वो, नही छाप साकी हूँ 
तो, रुका सा लगता है 
अबतो, सोनू का घर बसना पहली प्राथमिकता है फिरसे मुंबई जाने की सोचने लगती हु 
वक़्त फिर हाथ से निकल रहा है 

Saturday, 25 October 2014

बुआ जी के घर वो मौसम ऐसा ही था बुआ जी बहुत याद आती है उनके घर एकांत था किन्तु 
हम सब मोहल्ले के साथ थे 
बुआ जी के बड़े से घर की यादें ठहरी हुई है 
कितनी बातेहै, जो बहुत याद आती है 
उनकी, वो आरती, जो सब चले जाते थे तब बुआ जी कितनी अन्यमनस्क 
होकर घर के द्वार लगती थी
लिख नही पा रही हु बहुत ही गहरी स्मृति है वो, ठहरे हुए दिन वो, घर का सूनापन 
लेकिन कभी लगा नही की हम अकेले है 

Wednesday, 22 October 2014

वे दिन
वो, दिन स्वर्णिम थे चारों और 
सब तरफ हरियाली थी, 
घर में धन्य भरा होता था , बरषि के बाद तालाब भरा होता था,
घर के आँगन में फूलों की क्यारियों में 
पुष्प महकते थे 
घर में चारों और खेती की फसल की महक फैली होती थी 
आँगन में अनाज सुखाया जा रहा होता था घर के ढोलों में धन भरा होता था 
धान, जिसका चावल स्वादिस्ट व् सुपाच्य होता था घर की बड़ियों में पिछवाड़े 
सब्जियों की अवाक् होती 
सुबह हल्की ठण्ड होती 
पर हमारे पास ज्यादा स्वेटर नही होते थे हम 
सुबह उठकर सी सी करते इधर उधर भागते, 
उछल कूद करते 
जो, गौवें जनि होती 
उनके बछड़ों संग खेलते 
बहुत प्यारे दिन थे, 
और मन चाहा पढ़ते थे, 
बहुत अच्छा लगता था 
घर में नौकर चाकर की चहल पहल होती थी 
लगता ही नही था 
की वे दिन कभी बिट जायेंगे 
किन्तु, बिट चुके है 
यादें है की 
हमारे माता पिता ने बहुत म्हणत की थी 
सबके साथ मिलकर 
नौकर लगाकर खेती करते थे तो घर-आंगनों में धन-धान्य बिखरा व् भरा होता था अब, तो कल्पना भी नही है 
की घरों में इतना कुछ धान्य संग्रह हो सके 
उसे सम्भलना, १२ माह उसकी देखरेख होती थी घर में बनिहारें आती थी 
अब, एक नौकर भी नही रख पते 
खेती तो दूर की बात है 
आँगन बुहारने में पसीने छूट जाते है 
तब नौकरों की मजदूरी कम थी, 
तो, एक दो नही १० नौकर बनिहारें १२ माह रहते थे सबको धान देते थे 
वे दिन भर घर के व् 
खेती के काम करते 
गौओं को भी बहुत विधिवत सेवाकर पलटे थे आज की तरह नही की उनका जितना चाहा दूध 
निचोड़ा , और सड़कों पर छोड़ दिया फिर उन्हें चारा-पानी मिले न मिले 

Monday, 20 October 2014

जो
जो हमारे अपने थे 
वो, गांव से थे 
नही पता वो सब कहा पीछे छूट गए 
जो, खेती करते थे 
खेती में ही रमे रहते थे 
जीवन इतना कर्कश नही था 
जैसा आज भागदौड़ व् स्वार्थ से हो गया है 
हमने विकाश की अंधी दौड़ में 
उन लोगों को खो दिया है 
जो, बहुत प्यारे थे 
जो खेती करते थे गौ पालते थे 
ज्यादा शान नही थी 
फिर सिनेमा ने जिंदगी में 
ऐसे फैशन लाया 
जो, हमारे पैसे खाता है 
हम बहुत ज्यादा कमाते है 
किन्तु अकेले रहते है 
प्रायः टीवी के सहारे 
जो जीवन पहले था 
बहुत अपनेपन लिए था 
जो, लोग हमसे बिछड़कर बहुत दूर चले गए 
वो, हमे बहुत चाहते थे 
बहुत फैशन नही करते थे 
किन्तु, बड़े सुंदर थे 
जाने कहा चले गए 
वो, सब, 
जिनसे हमारे त्यौहार व् व्यहार मधुर थे 
आज हमसे सभी दूर है 
हम अकेले त्यौहार मनाते है 
अपने विगत को याद करते हुए 

Saturday, 18 October 2014

माँ
माँ से २-३ साल पहले मिलने गयी थी 
तो, माँ बोली, बाई 
अब तो उतरती आई है 
ये उसके सर्वथा विपरीत है 
जिसमे उम्र के चढ़ते दौर को भी माँ ने देखा था ये उतरती 
उम्र भी माँ देख रही है 
माँ ठीक कहती है 
मुझे भी नही पता था की उतरती 
आ जाएगी 
आज ही एक महोदय मिले 
बोले, आप उसवक्त तो, 
इतने कमजोर नही थी 
बेशक मैंने बहुत संघर्ष किया है 
और अपने बेटे के बहुत ही 
परेशानी के दौर को अकेले झेल है 
तब, सभी पीर , और मंदिर तक मई गयी हूँ 
वंही से दुआएं ली है 
आशा करती हूँ 
सबकी दुआ रंग लाएगी 
मेरे बेटे के जीवन में 
सफलता आएगी 

Friday, 17 October 2014

दिवाली
दिवाली के वक़्त में 
दिवाली में सभी क्या क्या नही करते 
मेरी छोटी बहन है 
बहुत प्यारी है घर भी बहुत बड़ा है, उसका 
किन्तु, दिवाली में उदाश है 
क्योंकि , दिवाली में उसे घरसे नई साड़ी लेने की इजाजत नही है 
वो, बहुत गलत महसूस करती है 
कहती है इतना सब-कुछ है 
किन्तु, मेरे लिए कुछ नही है 
सब कुछ होकर भी 
जो, आदमी अपनी पत्नी को एक साड़ी लेकर न दे सके 
और दिवाली में साड़ी को तरसाये 
क्या करे, 
वैसे भी हम सब हमेशा उसे कुछ लेकर देते रहे 
पर अब वो नही मांगती 
मई सोचती हूँ की 
वो, भी कोई ट्यूशन कर लेती तो 
अपने लिए कुछ ले सकती 
दूसरों के घरेलू मामलों में कुछ बोलना 
उचित भी तो नही। .... 
घर में बहुत सारी बातें होती है 
किन्तु हम अपने घर के प्रति हमेशा 
समर्पित ही रहेंगे 
क्योंकि, घर हमारा आश्रय होता है हमारा वजूद भी हमारा 
घर परिवार ही तो है……… 

Wednesday, 15 October 2014

दिवाली
दिवाली में कोई माँ के लिए 
नए कपडे बनाएंगे 
क्या ये होगा 
या माँ 
वंही पुराने 
जर्जर वस्त्रों में होगी 
दिवाली के वक़्त 

Sunday, 12 October 2014

आज चुप
आज चुपचाप बैठी थी, खूब तेज हवा चल रही है 
जाने क्यों बुआ जी के घर बिताये दिन याद आ गए 
बुआ जी के घर भी ऐसे ही दिन थे, क्या 
हाँ, वो बरस ऐसा ही हवा पानी याद आ रहा है 
मौसम की बेचैनी ऐसी ही हो गयी थी और 
मुझे लगता है, खूब बारिश आई थी 
तब ,  बहुत ओले गिरे थे 
सब और पत्तियां बिखर जाती थी 
जब हवा बी बारिश होती थी 
सॉरी , बहुत डिस्टर्ब है 
वो, वक़्त अलग था 
जिंदगी को तब जाना नही था 
जिंदगी क्या है 
ये आज भी पता नही 
किन्तु, बहुत सी चिंताएं तो है 
अबतो, मई ईश्वर का स्मरण करती हूँ 

Wednesday, 8 October 2014

धन सम्पति की
ऐसी आंधी चली है 
की मन ऊब सा गया है 
मई अपने लेखन में लग्न चाहती हूँ 

Friday, 3 October 2014

माँ को आज फोन पर बातें हुई 
माँ को मई दशहरे  की शुभकामना दे पाती 
इसके पहले ही माँ ने 
मुझे गांव आने की अनुनय की 
माँ की आवाज में कितना अपनापन है 
मई कल मासे मिलने जाउंगी 
एक रत गांव जाकर लौटूंगी 
तबतक आप सब मेरा घर देखिये 
आप सभी की शुभकामना चाहिए 
माँ से भजन सुन्ना 
माँ की बातें सुन्ना 
ये सब मेरे लिए सौभाग्य है 
हम सब इस दशहरे साथ है 
अगले बरस क्या हो 
कौन जनता है 
ये तो जिंदगी है 
आप सभी को दशहरे की शुभकामनाये 
और माँ का ढेर सारा आशीर्वाद भी 
कल माँ से कितनी बातें होगी 
माँ जो, हम सबके जाने पर 
कितने तरह के पकवान बनती थी 
वो, कितनी देरतक चूल्हे के सामने बैठे 
 आंच सहती हुयी 
हमारे लिए बड़े टलती थी माँ तुम महान हो 
मुझे पता है 
सभी की माएं 
ऐसी ही होती है 

Friday, 26 September 2014

जब भी माँ से फोन पर बातें होती है 
माँ किसी  खाने की इक्षा प्रकट करती है 
 ये बताती है , की उससे घर में कोई बात तक नही करता 
 तो,अच्छा नही लगता 
माँ ने तो सबके लिए सब  कुछ किया 
जब उसने सब बच्चों के लिए   
सबका लालन पालन लड़ पीयर प्यार  थी 
आज उसकी जो 
 टीआरएस आता है है 
७ बच्चों की माँ को बोलने  तरसना पड़ता है 
माँ तुम्हारे पास जा भी  
मई कंही से भी स्वंत्र नही हु 
तुम जब बीमार नही थी 
हमारे घर तक आ भी जाती थी 
जबसे परबस हुई हो  ही पड़े रहना 
  है 
फिर  तुम्हे भजन गेट देखने का मन होता है 
मन होता है, की 
तुम्हे तुम्हारे पसंद का  पकाकर खिलाऊ 

Tuesday, 23 September 2014

हिन्दुओं को सांकेतिक चीजें करना अच्छा लगता है
आज पितृ मोक्ष अमावस है
और सब अपने पितृ देव को तर्पण करते है
किंतु, कितने है
जो, जीते जी उन्हें तृप्त कर सके
कई बार कुछ पितृ जीते जी संतान को तरस भी देते है
किन्तु, सब ये सोचते है की सिर्फ बच्चे तरस दे रहे है
ऐसा हमेशा नही होता
रिश्ते हमेशा नत की रस्सी पर चलने जैसा  करतब होते है 

Monday, 15 September 2014

अपना बचपन
अपना बचपन बहुत याद आता है 
सीधा सदा सा 
भोला सा बचपन वो, बुआ जी का आँगन 
और वंहा पर  हमारा प्रवास 
ये नही पता था ,
की खेलते खेलते मुझे वंहा का सब कुछ 
छीन जायेगा 
और अपना प्यारा बसेरा छोड़कर 
मुझे वंहा से जाना होगा आज भी मन में 
उस प्रवास से दूर हो जाने की पीड़ा 
मेरे ह्रदय में कसकती है 
वो, बहुत प्यारे दिन थे मई बुआ जी के यंहा बहुत मजे में 
रहती थी जब हम अपने बाबूजी के गांव जाते तो बैलगाड़ी से जाते थे और 
तब बहुत अच्छा लगता था, 
रस्ते में मुझे नींद भी आ जाती थी उस नींद की झपकी , 
के लिए मन आज भी त्रस्त है 
तब बड़ी बुआ के यंहा 
श्राद्ध होता था 
सरे सारे जाती समाज वालों का भोज होता था 
फूफा व् बुआ तब 
सबके पांव धोकर उन्हें 
खाने को आमंत्रित करते थे अर्थात जितने भी आगंतुक होते 
सबके पांव दोनों मिलके ढोते थे वो, बेहद प्यारे व् न्यारे दिन थे तब स्टैंडर के लिए 
इतना खर्च नही था 
बहुत सम्पन्नता के बावजूद सादगी से रहते थे 
और एक बार पितृ पक्ष में 
हम सभी अपने जाती वाली बुआ के घर जीमने गए थे सब साथ में लाइन से बैठकर 
पंगत में कहते थे 
और बच्चे व् पुरुष पहले जयंती थे उस दिन की याद है, 
हम सभी अभी खा ही रहे थे 
पंगत चल रही थी की अचानक तेज अंधड़ के साथ 
पानी का बरसना शुरू हुआ था और देखते देखते 
बर्फ के ओले गिरने लगे थे ठंडी हवा की सिहरन के साथ 
हम ओले जो, छोटे थे जिन्हे हमारी ग्रामीण भाषा में 
गार्पित गार्पित गार्पित 
ऐसा कुछ कहते थे हमने उठकर मुख में डेल थे हाथों में ठंडा अहसास, रोमांचित होते हुए 
वो, सिहरन 
आज भी याद है 
अब, न तो 
वो, बचपन है, न ही वो लोग 
जाने कहा चले गए सबके सब जब याद करो तो, 
उनकी आवाजे कान में गूंजती है , बीएस 

Thursday, 11 September 2014

ये जिंदगी
ये जिंदगी उधर में नही मिलती 
हम जो कल थे, 
वो, आज नही है 
हम खुद को मेन्टेन तब करेंगे 
जब हमारी जेब में पैसा हो 
हम कल, क्या होंगे एक अनिश्चितता रहती है प्रति पल वो डरती है 
तभी हम ईश्वर की  जाते है 
और मांगते है की 
म्हे सलामत रखे, उपरवाला 
हमारे स्वप्न, हमारे आभाष 
हमारे  गुजरते है साथ व् साथी भी 
हालत के अनुसार बदलते है 
हम जब फर्ज निभाते है 
तभी दूसरे हमारे उप्र ज्यादा तोहमत  लगते है 

Tuesday, 2 September 2014

आँगन की १८८  पोस्ट्स ४११५ बार रीड की गयी है
आँगन की १८८ पोस्ट्स ४११५ बार पढ़ी गयी है 

Saturday, 30 August 2014

पुराने घर में
जो, गांव में है, वंहा पुराने घर में कभी भी सांप निकल जाते है ,
घर के भीतर सांपो के  भय  ही, 
किन्तु ये भी सत्य है 
की पिछले ५० बरस पुराने घरमे सांप निकल रहे है 
किन्तु , उन्हें न तो कोई मरता है न ही वो किसी को काटते 

Tere Aane Ki Jab Khabar Mehke - Jagjit Singh Ghazals 'Saher' Album

Agar hum kahein aur woh muskura dein (Chitra Singh, Jagjit Singh)

Tum yaad na aaya karo

माँ
माँ बाबू जी का वो घर पुराण व् जर्जर हो चूका है 
उस घर की दीवारें आसपास से ढहने लगी है 
वंहा आये दिन सांप निकलते है 
सभी चाहते है, 
नया मकान बन जाये 
किन्तु क्या इतना आसान है 
पुराने से मुक्ति पाना 
और नया बना लेना 
हमारे दिल में जो जगह होती है पुराने के लिए 
हम उसे एक दिन में नही बदल पाते 
आँगन बहुत आगे है 
१८२ पोस्ट के साथ, ४०५५ बार पढ़ा गया है, ये ब्लॉग 

Yeh Jeevan Hai Iss Jeevan Ka Yahi Hai Rang Roop - Kishore Kumar - Piya K...

Friday, 29 August 2014

आँगन बनारस की बयार से ज्यादा पढ़ा जा रहा है 
माँ से
माँ से आजकल हो पाती 
कभी माँ कुछ देरके लिए, घरसे बहार रहती तो 
हमसब उसे की कमी महसूस करते थे,
किन्तु अब माँ से बात करने समय नही निकलते 
बाबूजी , बाथरूम में फिसल गए 
वृद्धावस्था , की जो 
 वो, सभी को आणि है 
फिर भी अपने इतने प्रिय करुणा मई माँ व् पिता को देखने 
हम जा नही पाते 
उनका कर्ज कभी नही चूका सकते 

Wednesday, 13 August 2014

इस बार
इस  बार 
इस बार भुजलियों में भी माँ से बातें नही हो सकी 
आज कोशिश करती हूँ, की माँ से बातें करूँ 
वो, हमारे साथ, हमारे बीच है 
ये हमारा सौभाग्य है 

Sunday, 10 August 2014

बुआ जी भाई वाले गीत गति थी, किन्तु अंत समय में उनके कोई भी काम न आया, और वो अकेले ही, बहुत ज्यादा कष्ट सहकर मृ, यदि वो अकेले रहती तो भी इतना दुःख नही होता 

Friday, 1 August 2014

बुआ जी अपनी भीगी आवाज में गति थी सावन के गीत 
चार दिन रह गए सावन को 
नाड़े सुआ हो, भैया लिवैया जाये 
बुआ जी को कोई भैया लेने नही आते थे 
पर वो , यंही गाती थी 

Thursday, 31 July 2014

बुआजी सावन में बहुतसे लोक गीत गति थी 
उनके गए गीत मुझे भी याद है 
बताउंगी कभी 

Tuesday, 29 July 2014

गांवों की रवायतें अब बोझ बन गयी है 
महगाई ने सब कुछ सोख लिया है 
जो, जीवन रास था 
 जिंदगी ज्यादा मुश्किल है 
यंहा जिन मुश्किल है 
जीना मुश्किल है 
बहुत हिम्मत करनी होती है 
जिंदगी के लिए 
एक लेखक की कठिनाई तो 
वंही जनता है 
कोई भी लेखक को कुछ देना नही चाहता 

Wednesday, 23 July 2014

गाँवो तक प्रगति नही होती 
बहुओं को दासी ही समझते है 
गांवों में उन्हें मार डालते है 
पुलिस अपनी भूमिका नही निभाती 
क्रूर अपराधी खुले घूमते है 

Monday, 14 July 2014

माँ घर के सहन में बैठी सबकी राह देखती है 
सबको याद करती है 
माँ के जमाने में हम झूले झूलते हुए रेडिओ पर गीत सुनते थे आज माँ हारी थकी, एक जगह बैठी सुनी आँखों से 
सबकी राह देखती है माँ के पांवों में सूजन आ जाती है , कोई उससे नही बोलता 

Saturday, 12 July 2014

 गुरुपूर्णिमा कल थी 
माँ कितनी पूजा पथ किया करती थी 
माँ तब कितनी तेजस्वी लगती थी 
माँ तुझे क्या हो गया 
तुम हमेशा संतो का सत्कार कर आनंदित होती थी 
माँ तुम्हारी तरह हम तो नही हो सके 
माँ तुम्हारी इज्जत भी हम नही कर सके 
माँ तुम्हारे ज्ञान को नही समझ सके 
माँ तुम्हारी तरह परमात्मा को नही भज सके 
माँ तुम इतनी ममतामयी रही 
तुम्हारे ह्रदय में करुणा भरी रही 
तुम ज्ञान के साथ प्रेम को भी मानती रही 
हमेशा मेहमानों का स्वागत करती रही 
तुमने हम सात बहन भाइयों का लालन-पालन ही नही किया 
जबतक बना घर में गौ-पालन होता रहा 
कृषि, खेती की संस्कृति को तुमने जीवित रखा 
माँ तुम महान हो 
तुमने घर में काम करने वालों को भी ममता से रखा 
माँ तुम्हारे संग हमारी भक्ति की धारा चलती रही 
माँ तुम शांति हो तुम्हारा मन सदैव वैराग्य से भरा रहा 
ऐसी भक्ति-भाव रखने वाली 
गुरुओं को मानने वाली माँ को साधुवाद , सत्कार, अभिनन्दन 

Friday, 11 July 2014

Yeh Zindagi Usi Ki Hai - Lata Mangeshkar, Anarkali Song

वो गर्मियों के दिन थे 
वो गर्मियों के दिन थे 
बुआ जी पूरी दोपहरी सफर कर  पहुंची थी 
और घर पहुँचते ही 
उन्होंने दूध की अलमारी से 
दही निकालकर खाया था 
वे जैसे थक सी गयी थी 
बुआ जी अपना दुःख नही बता सकी किसी को 

Thursday, 10 July 2014

याद आता है
जब गर्मी में बुआ जी
हमारे घर थकी हुई आई थी
तो , उन्होंने
रसोई से दही लेकर खाया था वे सफर से थकी थी ये आज समझ में आता है 

Friday, 6 June 2014

एक पागल लड़की अक्सर मुझे बेचैन कर देती है
एक बेचैन रूह की तरह तड़पती हूँ 
मेरी सेहत अच्छी नही है 
आजकल परेशान हु न 
शहर छोड़ते वक़्त सब समेटना मुस्किल है 

Thursday, 5 June 2014

To ask from you,
Kaun ho tum 
So, it will not be a question Tedha 
You can be a restless soul 
Cycle in which the fingers Bissau 
Padma also be congenital 
And whose lives have changed in more than 100 sights 
Always understand what the new shelters 
What may be a place for 
Why, this cycle with me 
I like my own fault 
Flowing water, ie rivers 
And burning the 
Not a precipice on my anxiety 
When the mind focus 
Still trying to keep 

Wednesday, 4 June 2014

ये पु 
ये ऊओ ये राममंदिर 
मई एक एक दिन गिनती हूँ 
कभी चैन से नही रहती 
अब गांव जाउंगी 
ये सोचके भी उत्सुक हूँ सब कुछ नया हो जैसे 
माँ  मिलना 
माँ की ध्यानमग्न सूरत को याद करती 
आयशा नन्ही बच्ची दो दिन नही थी 
आज लौटी 
मेरी गॉड में खेलती रही 
और दिवालके स्विच को जलाने 
उसे उप्र उठती मई 
खुश होती रही 
मई इतने दूर आकर 
शायद आयशा की स्मृति को साथ ले जाउंगी आयशा 
एक डेढ़ बरस की बच्ची 
उसकी नानी दुबई जाएगी 
और मई गांव 
उसके नन्हे से दिमाग को नही समझेगा 
की हम कहा चले गए 
बच्चे तभी तो सब कुछ भूल जाते है 

Tuesday, 3 June 2014

माँ एक ही जगह
माँ एक ही जगह बैठी रहती है अक्सर कहती है
की गर्दन हिल रही है
माँ की अशंख्य तकलीफों के बीच भी माँ
माँ है
मेरी सीधी सदी माँ 
जो, अक्सर मेरे पिता की बातें सहती रही 
हूँ कहने की पितृ सत्तात्मक आदतों में 
माँ चुपचाप सहकर 
मानसिक रूप से टूट गयी 
बीमर हो गयी 
किन्तु उसकी भक्ति के स्वाभाव ने उसे 
पत्ते पर राखी  जल बिंदु सा 
निर्लिप्त निर्विकार रखा 
माँ तुम सच्ची साधिका हो ईश्वर को 
प्रिय भी तुम्ही हो 

chhoti si ye duniya... film rangoli रंगोली

अपनी माँ को सबसे बड़ी योगी व् तपस्विनी मानती हूँ, उसने बहुत दुःख सहे , व् अभी भी वो त्याग व् तपस्या की देवी है , माँ इतनी सादगी  रहती है , और स्वभाव से सीधी है 
अपने बेटे के साथ सुरक्षित महसूस करती हूँ, 
जीवन में अपने बेटे के साथ देने से ही , इतनी दूर आ सकी हूँ अक्सर राह चलते खड़े होकर विचरने लगती हूँ 

Zindagi Denewale Sun Teri Duniya Se Dil Bhar Gaya

Monday, 2 June 2014

जब काम हो करने को तब 
किस ध्यान में लगे 
माँ की याद आती है 
जो, रातदिन ध्यान में रहती है 
हमारा कर्तव्य ही हमारा ध्यान है जिन्हे 
ध्यान लग्न हो बिना प्रयाश लग जाता है 
इश्लीए जबरदस्ती कोशिश नही करे सहज शांति 
अपने कर्तव्य से ही मिलती है 

Sunday, 1 June 2014

1919 Sunnyside Deleted Scene-Charlie The Barber

यंहा मेरा संघर्ष उम्र के हिसाब से अब लास्ट स्टेज में है 
मेरा ग्लैमरस रहन सहन नही होने से यंहा की   दुनिया में 
 मेरा  
 किन्तु  उम्र वालों को शायद कुछ सफलता मिले 
खान 

Saturday, 31 May 2014

ज्यों 
ज्यों ज्यों जाने के दिन नजदीक आ रहे है 
मैंने संघर्ष बंद कर दिया है खुदको  किताबों की दुनिया से ही जोडूंगी 
मेरी किताबें छाप रही है इतना ही बहुत है 
आने जाने के इस खेल मेमे मुझे जिंदगी उदास कर देती है 
किन्तु खुश रहना है , उदाश नही 
आज दिनभर आयशा भी बिल्डिंग में नही है, वो एक स्व बरस की बच्ची है जो , उसकी मम्मी के 
ऑफिस जाने पर सारा वक़्त सबके साथ खेलती है, उसकी नानी दुबई से आई थी , शायद जाने वाली थी 
इश्लीए मेहमानों का अनजाना रहा , आज वंहा सुना है 
इन्ही तो जिंदगी है , जन्हा आज मेले लगते है 
कल वंहा सुनसान लगता है 
मौसम बदलते है 

Mohabbat Karne' Wale',Kum Na Hon Ge'...!!!

Friday, 30 May 2014

सच्चाई ये है की मुंबई में अपना काम ही अपना होता है 
यदि आपके पास अकपका काम नही हो तो 
समझो आपका यंहा कोई नाम लेवा नही 
एक पागल लड़की यंहा पर भीख मांगती है इन्ही सो भी जाती है ये उसका रोजगार है जब आपका रोजगार हो तभी आप कंही रह सकते है 
पहले  की सिनेमा के गानों से बिगड़ जाते है 
सिनेमा का शौक आपको कंही ले जा सकता है 
मुझे देखने का नही बनाने का शौक लगा 
किन्तु लिए बहुत पैसा चाहिए